उपन्यास अंश

लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 32)

भरत जी ने शत्रुघ्न जी को आदेश दिया कि नगर की हर प्रकार से सजावट करें और मार्गों को ठीक करायें, ताकि सभी लोग नगर से बाहर आकर श्री राम का स्वागत कर सकें। आदेश पाकर शत्रुघ्न जी ने श्रमिकों के दल बनाकर उनको कार्य सौंप दिये और वे सभी तत्काल काम पर लगा दिये गये। आठों मंत्रियों ने विभिन्न कार्यों की देखभाल का कार्य आपस में बाँट लिया। प्रातःकाल तक नगर को सुगंधित पुष्पों, पताकाओं, स्वागतद्वारों आदि से सजा दिया गया।

जैसे ही अयोध्या में यह समाचार पहुँचा कि श्री राम लौट रहे हैं, वैसे ही वहाँ आनन्द छा गया। सभी माताओं ने अपने देवताओं की पूजा-स्तुति की और महल को सजाया। सभी अयोध्यावासियों ने भी श्री राम के आगमन की प्रसन्नता में अपने-अपने घरों और मार्गों को फूलों और प्रकाश से खूब सजाया। वे रात्रिभर आनन्दोत्सव मनाते रहे और प्रातःकाल होने की प्रतीक्षा करने लगे।

इधर शयन करने से पूर्व भरत जी ने हनुमान जी से कहा कि मुझे भैया के वनवास का समाचार विस्तार से बताओ। हनुमान जी ने कहा- ”रघुनन्दन! आपको चित्रकूट तक का समाचार तो ज्ञात है ही, उससे आगे की कथा मैं आपको बताता हूँ, जैसी मुझे ज्ञात है।“ फिर उन्होंने श्री राम द्वारा चित्रकूट छोड़कर दण्डकवन में प्रवेश करने से लेकर रावण वध और सीता जी को लेकर लौटने तक के सभी समाचार विस्तार से बताये, जिनको सुनकर भरत जी बहुत प्रसन्न हुए और कहा- “आज बहुत समय के बाद मेरा मनोरथ पूर्ण हुआ है।” भरत जी को दुःख भी हुआ कि भैया-भाभी ने इतने कष्ट सहन किये और मुझे उनकी सूचना तक नहीं मिल सकी। फिर वे हनुमान जी को शयन करने की कहकर स्वयं भी विश्राम करने चले गये।

हनुमान जी ने भरत जी की मनःस्थिति समझकर जान लिया कि वे अवश्य ही श्रीराम को राज्य सौंप देंगे, इसलिए उन्हें प्रयाग में लौटकर श्री राम को रोकने की आवश्यकता नहीं है। अतः वे निश्चिन्त होकर शयन करने लगे।

प्रातः उठकर हनुमान जी जब तक नित्य कर्मों से निवृत्त हुए, तब तक भरत जी, शत्रुघ्न जी, सभी माताएँ, कुलगुरु वशिष्ठ जी, सभी मंत्रीगण, सभासद और अयोध्या के नागरिक विभिन्न सवारियों पर चढ़कर श्री राम की अगवानी के लिए नन्दीग्राम में आ चुके थे और अत्यन्त उत्सुकता से श्री राम की प्रतीक्षा कर रहे थे। तब भरत जी ने माताओं सहित सभी से हनुमान जी का परिचय कराया और उनकी बहुत प्रशंसा की। हनुमान जी ने सभी माताओं और वशिष्ठ जी के चरण स्पर्श करके आशीर्वाद पाया। फिर वे सभी दक्षिण दिशा के आकाश की ओर देखते हुए श्री राम की प्रतीक्षा करने लगे। भरत जी भी श्री राम की चरण पादुकाओं को सिर पर धारण किये उनके आगमन की प्रतीक्षा करने लगे।

जब भरत जी को देर तक विमान दिखायी नहीं दिया, तो वे सोचने लगे कि हनुमान जी ने कहीं असत्य सूचना देकर उनके साथ परिहास़ तो नहीं किया है। उन्होंने अपनी शंका व्यक्त की, परन्तु हनुमान जी ने कहा- “रघुनन्दन! मैंने आपके साथ परिहास नहीं किया है। आप चिन्तित मत होइए शीघ्र ही श्री राम आ जायेंगे।” उसके कुछ समय बाद ही एक चमकीले चाँद के रूप में विमान आता हुआ दिखाई दिया। निकट आने पर सबने श्री राम, लक्ष्मण जी और सीता जी को पहचान लिया। उनके साथ वानरवीर और विभीषण जी सहित राक्षस योद्धा भी विमान पर सवार थे।

सबको अपने स्वागत के लिए एकत्र देखकर श्री राम ने विमान को वहाँ उतार दिया। सबसे पहले भरत जी उस विमान पर चढ़ गये और श्री राम का अभिवादन करके उनकी पादुकाएँ उनके चरणों में पहना दीं और कहा- “भैया! मेरे पास धरोहर के रूप में रखा हुआ आपका राज्य आज पुनः आपके चरणों में अर्पित है।” श्री राम ने उठकर भरत जी को अपने हृदय से लगा लिया। फिर वे विमान से धरती पर उतर आये।

श्री राम के पीछे-पीछे सीता जी, लक्ष्मण जी, सुग्रीव जी, विभीषण जी आदि सभी पुरुष और स्त्रियाँ विमान से उतर आये। श्री राम ने नीचे उतरकर पहले अपने गुरुदेव वशिष्ठ, फिर तीनों माताओं के चरण स्पर्श करके प्रणाम किया और अन्य नागरिकों से भी यथायोग्य अभिवादन किया। लक्ष्मण जी और सीता जी ने भी ऐसा ही किया। श्री राम ने सभी वानर वीरों और राक्षस योद्धाओं का परिचय सबको कराया और कृतज्ञतापूर्वक कहा कि इन सबकी सहायता से ही मेरा वनवास सफल हुआ है। भरत जी ने उन सबका आलिंगन करके सत्कार किया।

— डॉ. विजय कुमार सिंघल
आश्विन कृ. 5, सं. 2082 वि. (12 सितम्बर, 2025)

डॉ. विजय कुमार सिंघल

नाम - डाॅ विजय कुमार सिंघल ‘अंजान’ जन्म तिथि - 27 अक्तूबर, 1959 जन्म स्थान - गाँव - दघेंटा, विकास खंड - बल्देव, जिला - मथुरा (उ.प्र.) पिता - स्व. श्री छेदा लाल अग्रवाल माता - स्व. श्रीमती शीला देवी पितामह - स्व. श्री चिन्तामणि जी सिंघल ज्येष्ठ पितामह - स्व. स्वामी शंकरानन्द सरस्वती जी महाराज शिक्षा - एम.स्टेट., एम.फिल. (कम्प्यूटर विज्ञान), सीएआईआईबी पुरस्कार - जापान के एक सरकारी संस्थान द्वारा कम्प्यूटरीकरण विषय पर आयोजित विश्व-स्तरीय निबंध प्रतियोगिता में विजयी होने पर पुरस्कार ग्रहण करने हेतु जापान यात्रा, जहाँ गोल्ड कप द्वारा सम्मानित। इसके अतिरिक्त अनेक निबंध प्रतियोगिताओं में पुरस्कृत। आजीविका - इलाहाबाद बैंक, डीआरएस, मंडलीय कार्यालय, लखनऊ में मुख्य प्रबंधक (सूचना प्रौद्योगिकी) के पद से अवकाशप्राप्त। लेखन - कम्प्यूटर से सम्बंधित विषयों पर 80 पुस्तकें लिखित, जिनमें से 75 प्रकाशित। अन्य प्रकाशित पुस्तकें- वैदिक गीता, सरस भजन संग्रह, स्वास्थ्य रहस्य। अनेक लेख, कविताएँ, कहानियाँ, व्यंग्य, कार्टून आदि यत्र-तत्र प्रकाशित। महाभारत पर आधारित लघु उपन्यास ‘शान्तिदूत’ वेबसाइट पर प्रकाशित। आत्मकथा - प्रथम भाग (मुर्गे की तीसरी टाँग), द्वितीय भाग (दो नम्बर का आदमी) एवं तृतीय भाग (एक नजर पीछे की ओर) प्रकाशित। आत्मकथा का चतुर्थ भाग (महाशून्य की ओर) प्रकाशनाधीन। प्रकाशन- वेब पत्रिका ‘जय विजय’ मासिक का नियमित सम्पादन एवं प्रकाशन, वेबसाइट- www.jayvijay.co, ई-मेल: jayvijaymail@gmail.com, प्राकृतिक चिकित्सक एवं योगाचार्य सम्पर्क सूत्र - 15, सरयू विहार फेज 2, निकट बसन्त विहार, कमला नगर, आगरा-282005 (उप्र), मो. 9919997596, ई-मेल- vijayks@rediffmail.com, vijaysinghal27@gmail.com