कविता

नहीं चलना उन राहों में

दस साल से ऊपर हो गया
मेरे पिताजी को दुनिया छोड़े,
कभी भी नहीं सपने में कहा
कि खिलाना पितृपक्ष में थोड़े,
जो छोड़ गया है साथ यहां पर
बस यादें हैं सबकी रह जाना,
छप्पनभोग खिलाओ जिसको
मृत पुरखे खा नहीं सकते खाना,
चोंचला नहीं दिखाना मुझको
जो होता पखवाड़े भर का,
यदि आ गया मैं भी झांसे में
संतुलन बिगड़ सकता है घर का,
रोज कमाना रोज ही खाना,
मेरे जीवन की यहीं कहानी,
कौन कर रहा क्या यहां पर
पाखंड से जीवन नहीं सजानी,
छोड़ आया ये सब कुछ मैं तो
बस नैतिक राहों को नहीं छोड़ना,
पैसे वालों के चोंचले की ओर
अपनी राहों को नहीं मोड़ना,
महापुरुषों ने दिखाये रास्ते
उस पर ही है अब चलते जाना,
औरों की संतुष्टि के खातिर
दुनियादारी अब नहीं निभाना,
कह सकते हो धर्म भ्रष्टि मुझे
नहीं फर्क मुझे इससे पड़ेगा,
लिप्त हो जाऊं अंधविश्वासों में
सुत विज्ञान युग में कैसे लड़ेगा।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554