लघु उपन्यास: रघुवंशी भरत (कड़ी 33 अंतिम)
भरत जी ने सुग्रीव जी का स्नेह से आलिंगन करते हुए कहा- “सुग्रीव! तुम हम चारों के पाँचवें भाई हो।” फिर उन्होंने विभीषण जी का प्रगाढ़ आलिंगन करते हुए कहा- “बड़े सौभाग्य की बात है कि आपकी सहायता से श्री राम ने अत्यन्त दुष्कर कार्य पूरा कर लिया।” भरत जी ंने श्री राम से कहा- “भैया! आप राज्य का कोष, घर, भंडार और सेना सब देख लें। आपके प्रताप से ये सभी वस्तुएँ पहले से दस गुना हो गयी हैं।” भरत जी की यह बात सुनकर सभी लोगों को बहुत हर्ष हुआ।
श्री राम के स्वागत की औपचारिकता पूरी होने के बाद भरत जी ने हाथ जोड़कर उनसे कहा- “भैया! आपने मेरी माता के वचनों का सम्मान करते हुए जो राज्य मुझे दिया था, वह मैंने आपको सौंप दिया। अब सभी जनों की यह इच्छा है कि वे आपका राज्याभिषेक देखें। जब तक यह संसार है, तब तक आप इसके स्वामी बने रहें।” यह सुनकर श्री राम ने “ऐसा ही हो” कहकर अपनी स्वीकृति दे दी।
फिर तत्काल ही शत्रुघ्न जी की आज्ञा से निपुण नाई बुलाये गये। उन्होंने श्री राम, लक्ष्मण जी और भरत जी की जटाओं को सुधारकर सुन्दर बालों का रूप दिया। फिर सबने स्नान किया और सुरुचिपूर्ण राजसी वस्त्र धारण किये। वस्त्राभूषण धारण करके श्री राम सुन्दर सिंहासन पर बैठे। सभी रानियों ने सीता जी का मनोहर शृंगार किया। कौशल्या जी ने बड़े हर्ष से वानरपत्नियों का भी सुन्दर शृंगार किया।
सभी मंत्री पुरोहित वशिष्ठ जी के साथ मंत्रणा करने लगे कि अभिषेक के लिए क्या-क्या सामग्री चाहिए। मंत्रणा के बाद उन्होंने सेवकों को आवश्यक आदेश दे दिये। फिर शत्रुघ्न जी की आज्ञा से सुमन्त्र जी एक सुन्दर रथ तैयार करके ले आये। उस पर श्री राम आरूढ़ हुए। उस समय भरत जी रथ के सारथी बनकर घोड़ों की बागडोर सँभाले हुए थे। शत्रुघ्न जी ने छत्र लगा रखा था और लक्ष्मण जी तथा विभीषण जी चँवर डुला रहे थे। सभी वानर योद्धा हाथियों पर सवार थे।
वाद्यों की मंगलध्वनि के बीच सभी नगर की ओर चले। नगरवासियों ने उनको आते देखकर बहुत हर्षनाद किया। श्री राम ने अपने मंत्रियों को हनुमान जी और अन्य वानर वीरों के अद्भुत पराक्रम के बारे में बताया, जिसे सुनकर सभी बहुत विस्मित हुए। धीरे-धीरे चलते हुए वे राजभवन परिसर में पहुँच गये। श्री राम अपने पूर्वजों और पिता के भवन में गये। उन्होंने अपना निजी विशाल भवन सुग्रीव जी को देने का आदेश दिया।
आवश्यक सामग्री आ जाने पर वशिष्ठ जी ने श्री राम को एक सुन्दर चौकी पर बैठाया। फिर उन्होंने श्री राम का विधिपूर्वक अभिषेक किया। उनके बाद ब्राह्मणों और सभी मंत्रियों ने भी श्री राम का अभिषेक किया। इसके पश्चात अन्य योद्धाओं और प्रमुख नागरिकों ने श्री राम का अभिषेक किया। अन्त में वशिष्ठ जी ने इक्ष्वाकुवंशी राजाओं का श्रेष्ठ मुकुट श्री राम के मस्तक पर धारण कराया। श्री राम के राज्याभिषेक को लंकापति विभीषण और वानरराज सुग्रीव जी अति आश्चर्य से देख रहे थे कि किस प्रकार छोटे भाई ने बड़े भाई के पक्ष में अपने हाथ में आये हुए विशाल साम्राज्य को ठोकर मार दी। वे भरत जी की ओर बहुत स्नेह और सम्मान से निहार रहे थे। वे दोनों स्वयं अपने-अपने बड़े भाइयों का वध कराकर शासक बने थे, इसलिए उनका अभिभूत होना आश्चर्य की बात नहीं है।
राज्याभिषेक संस्कार सम्पन्न होने के बाद श्री राम ने ब्राह्मणों और याचकों को दान दिये और अपने मित्रों को भी रत्न आदि भेंट किये। सीता जी ने अपने गले से सुन्दर मोतियों की माला उतारकर श्री राम की सहमति से हनुमान जी को भेंट की, जिसे पाकर हनुमान जी की प्रसन्नता की सीमा न रही।
अपने अभिषेक के बाद श्री राम ने लक्ष्मण जी को युवराज पद देने की इच्छा व्यक्त की, परन्तु लक्ष्मण जी ने किसी भी तरह इसे स्वीकार नहीं किया। तब श्री राम ने भरत जी को युवराज पद पर प्रतिष्ठित किया। फिर वे दोनों मिलकर अयोध्या का राजकार्य देखने लगे और प्रजा का पालन करने लगे।
(समाप्त)
— डॉ. विजय कुमार सिंघल
आश्विन कृ. 7, सं. 2082 वि. (14 सितम्बर, 2025)
