कविता

बंजर श्मशान

बंजर श्मशान कभी सोचा हैं क्या
श्मशान का बंजर होना भी
चिंता का विषय है

हाँ सुना है गाँवों में
श्मशान में उग रहे हैं काँटे
बड़़े चित्र विचित्र से
ऐसा लगता है
ये हांड़ माँस विहीन पूर्वज है
नुकीली नजरों से
पूछ रहे है पैने सवाल
श्मशान की आग और राख़
बेच आये हो तुम कौन से शहर में

क्यों नहीं चाक पर फिसलती है मिट्टी
गढ़ा जाता है घडा़
इन दिनों नहीं टूटता श्मशान की छाती पर

बस्ती से श्मशान तक की पगडण्डी
क्यूँ उठ चली हैं सड़कों की तरफ
वे पाषाणी कंधे तुम ले गये कहाँ
जिसने दी थी मुझे अंतिम बिदाई

— सरिता सैल

सरिता सैल

कारवाड़, कर्नाटक संपर्क 8431237476 saritasail12062@gmail.com