कथा साहित्य

विह्स्की विला – भाग 6

‘मॉम से मुझे उसे दिन से नफरत थी और ये नफरत इंतकाम में तब बदल गई जब उन्होंने हमारे सेक्स की वीडिओ बनाके ब्लेकमेल किया और आपको अपने बिस्तर के लिए मुझसे छीन लिया जबकि एक आप ही थे जो मेरे इस नीरस जीवन में खुशियां लाये थे।’
कह कर ज्वाइस चुप हो गई थी। कुछ देर बाद मैने पूछा ‘आपकी मॉम को गैर मर्दों की यूँ लत कैसे लग गई ?’
‘कैसा सवाल पूछ रहे हो गालव बहुत सी औरतें हैं दुनिया में जिन्हे ये लत होती है फिर मेरे मॉम के पास तो बेशुमार दौलत आ गई थी जिससे वो महंगे क्लब और पार्टियों में जाने लगी। TH अक्सर घर से बाहर रहते थे ऐसी हालत में एक बार किसी गैर मर्द की बांह में गिरी तो फिर सिलसिला ही चल निकला। और फिर जब ये लत हद से ज्यादा बढ़ गई तो आपको ट्रेप करके घर पर ही रख लिया।’
‘ये TH कौन है ?’ मेरे सवाल के जवाब में ज्वाइस बोली ‘तसद्दुक हुसैन – मेरी मॉम का दूसरा शौहर और नवेद खान से हमें बचाने के लिए बलि का बकरा।’
कह कर ज्वाइस हंसी, साथ में मैं भी हंसा।
जब हम पुलिस स्टेशन में घुसे तो इन्स्पेक्टर नवेद खान अपने मातहतों को कुछ इंस्ट्रक्शन दे रहा था। इशारे से हमें बैठने को कह कर वो वापस अपने स्टाफ के साथ बिज़ी हो गया।
कुछ देर बाद वो हमारे सामने अपनी चेयर पर आकर बैठते हुए बोला ‘ज्वाइस मैडम आपके फैमली में तो सब एक से एक बढ़कर शातिर हैं।’
‘जी आफिसर मैं आपकी बात समझी नहीं।’
‘ज्वाइस जी आपके साथ जो ये लौंडा बैठा है मेरे शक के दायरे में है।’
‘जी ये आप हमें फोन पे बता चुके हैं।’
‘इसने खुद कबूल किया कि इसके समरीन मैडम मतलब आपकी मॉम के साथ जिस्मानी ताल्लुक थे।’
‘तो ?’ ज्वाइस से शायद नवेद खान को इतने छोटे और बेफिक्री वाले जवाब की उम्मीद नहीं रही होगी इसलिए वो अपने कुछ सोच के अपने होठों को गोल करके के बोला ‘और आपकी मम्मी से शारीरिक संबंध रखने वाला ये लौंडा आपके साथ साये की तरह साथ रह रहा है, मतलब आपका भी इसके साथ कुछ तो है।’
‘इन्स्पेक्टर साहब मैं आपके इस -कुछ तो है – का मतलब समझ रही हूँ पर ये सब कहने का आपको कोई हक़ नहीं है ये मेरा पर्सनल मैटर है।’ ज्वाइस ने नवेद खान को जवाब देते हुए एक नज़र मुझे पे डाली थी।
‘मर्डर वाले केस में कुछ भी पर्सनल नहीं रहता मोहतरमा, हमें ऐसे सवाल पूछने का हक़ है।’ कह कर इन्स्पेक्टर नवेद अपनी दोनों कोहनी टेबल पर टिका के मेरी और ज्वाइस की आँखों में बारी – बारी से देखा।
‘आप सही समझ रहे हैं मै गालव के साथ रिलेशनशिप में हूँ।’ ज्वाइस ने इस बार बगैर किसी बहस के इंस्पेकटर के सवाल का जवाब बिना लाग लपेट के दिया।
ज्वाइस की बात सुनके इंस्पेकटर ने अपने होठों को गोल करके और आँखें सिकोड़ के मुझे देखते हुए कहा ‘अरे ऐसी क्या ख़ास बात है इस लौंडे में जो माँ – बेटी दोनों ही…।’ अपनी बात अधूरी छोड़के वो बात बदलते हुए बोला ‘ख़ैर मुझे इसमें कोई मसअला नहीं पर ज्वाइस मोहतरमा क्या आपको एक बार भी ऐसा नहीं लगा कि आपकी मॉम से शारीरिक संबंध रखने वाले इस लौंडे से ताल्लुक खत्म कर लेने चाहिए।’
‘लगा था।’
‘फिर खत्म क्यों नहीं किया ?’
‘क्योंकि।’ मेरी और देखते हुए ज्वाइस बोली ‘क्योंकि मैंने मर्द की इन आदतों के बारे काफी सुना और पढ़ा है।’
‘किन आदतों के बारे में ?’
‘सुन्दर औरत और लड़की का जिस्म अगर थोड़ा भी हिस्सा दिख जाये तो वहीँ लार बहाने को तैयार हो जाते हो भले ही वो किसी के पति या बॉयफ्रेंड हो।’ कहते हुए ज्वाइस के चेहरे पर ऐसे भाव उभरे जैसे वो मुझसे नफरत करती हो। सच कहूं तो मै ज्वाइस के इस तेवर पर भीतर तक हिल गया था, अगरचे मैं वो स्क्रिप्ट जानता था जो ज्वाइस ऐसे हालातों में बोलने वाली थी। सच ज्वाइस की अदाकारी ने मेरे मन में उसके लिए मुहब्बत को बढ़ाने का काम किया था।
‘मोहतरमा मैं भी मर्द हूँ।’ इन्स्पेक्टर नवेद बोला ‘पर मेरी लार आज तक आपके बयां किये गये हालातों में कहीं नहीं बही।
‘आपकी बीवी खुसनसीब है इन्स्पेक्टर साहब।’ ज्वाइस कहके मुस्कराई।
‘शुक्रिया मोहतरमा।’ इन्स्पेक्टर नवेद कुछ देर खामोश सोचने के बाद बोला ‘एक बात ओर पूछनी है।’
‘जी पूछिए।’
‘आपके लहजे से लगा कि लार टपकाने वाले मर्दों से आप नफरत करती हैं तो इस लिहाज़ से आपको इस लौंडे से भी नफरत करनी चाहिए थी।’
‘करनी चाहिए थी, बिलकुल।’
‘पर मुझे नफरत कहीं नज़र नहीं आ रही।’
‘नहीं आएगी नज़र।’
‘क्यों ?’
‘क्योंकि मेरी मुहब्बत मेरी नफरत से कई गुना ज्यादा ऊँची है।’
‘तो आप अपनी इस ऊँची मुहब्बत जिसकी कुछ ऊंचाई आपकी मॉम भी इस्तेमाल कर रही थी, उसे वापस मुकम्मल हासिल करने के लिए अपनी मॉम को कब्र की गहराई में भी पहुंचा सकती हैं।’
मुझे लगा था इन्स्पेक्टर नवेद खान की बात सुनके ज्वाइस के चेहरे की रंगत उड जायेगी पर ऐसा कुछ भी मुझे देखने को नहीं मिला। उसके खूबसूरत चेहरे पर अपार शांति थी।
कुछ देर यूँ ही शांतचित्त वो बैठी रही फिर बोली ‘इंस्पेकटर साहब आपकी जगह अगर मैं होती तो बिल्कुल ऐसा ही सोचती, पर मै ये भी सोचती हूँ कि…।’
ज्वाइस ने अपनी बात अधूरी छोड़ दी थी।
इन्स्पेक्टर नवेद ने व्यग्रता से उसे अपनी बात पूरी करने को कहा।
‘मैं सोचती हूँ इन्स्पेक्टर साहब, सोचती क्या बल्कि मैं जानती हूँ कि आप मेरी मॉम के असली क़ातिल को ही पकड़ेंगे और वो भी जल्दी ही। और हाँ उस वक़्त क़ातिल में उनमे से कोई नहीं होगा जो इस समय आपके सामने बैठे हैं।’
क्रमश:
–सुधीर मौर्य

सुधीर मौर्य

नाम - सुधीर मौर्य जन्म - ०१/११/१९७९, कानपुर माता - श्रीमती शकुंतला मौर्य पिता - स्व. श्री राम सेवक मौर्य पत्नी - श्रीमती शीलू मौर्य शिक्षा ------अभियांत्रिकी में डिप्लोमा, इतिहास और दर्शन में स्नातक, प्रबंधन में पोस्ट डिप्लोमा. सम्प्रति------इंजिनियर, और स्वतंत्र लेखन. कृतियाँ------- 1) एक गली कानपुर की (उपन्यास) 2) अमलतास के फूल (उपन्यास) 3) संकटा प्रसाद के किस्से (व्यंग्य उपन्यास) 4) देवलदेवी (ऐतहासिक उपन्यास) 5) माई लास्ट अफ़ेयर (उपन्यास) 6) वर्जित (उपन्यास) 7) अरीबा (उपन्यास) 8) स्वीट सिकस्टीन (उपन्यास) 9) पहला शूद्र (पौराणिक उपन्यास) 10) बलि का राज आये (पौराणिक उपन्यास) 11) रावण वध के बाद (पौराणिक उपन्यास) 12) मणिकपाला महासम्मत (आदिकालीन उपन्यास) 13) हम्मीर हठ (ऐतिहासिक उपन्यास) 14) इंद्रप्रिया (ऐतिहासिक उपन्यास) 15) छिताई (ऐतिहासिक उपन्यास) 16) सिंधुसुता (ऐतिहासिक उपन्यास) 17) अधूरे पंख (कहानी संग्रह) 18) कर्ज और अन्य कहानियां (कहानी संग्रह) 19) ऐंजल जिया (कहानी संग्रह) 20) एक बेबाक लडकी (कहानी संग्रह) 21) हो न हो (काव्य संग्रह) 22) पाकिस्तान ट्रबुल्ड माईनरटीज (लेखिका - वींगस, सम्पादन - सुधीर मौर्य) पुरस्कार - कहानी 'एक बेबाक लड़की की कहानी' के लिए प्रतिलिपि २०१६ कथा उत्सव सम्मान। ईमेल ---------------sudheermaurya1979@rediffmail.com