मामला दिल का है
उन के पास भी पान के पत्ते वाली आकृति है और इन के पास भी यही पान के पत्ते जैसी आकृति है । वैसे तो दोनों ही समान है ,जिसे ये दिल कह रहे या बता रहे हैं। और दोनों ही इसे एक जैसा भी कह रहे हैं। पर जब यह एक जैसा ही है तो फिर पत्थरबाजी कौन कर रहा है। इस का मतलब उन का दिल इन के दिल से बिल्कुल ही अलग है। यह तो साफ़ पता चल रहा है।
पत्थर भी ऐसे वैसे नहीं बड़े बड़े पत्थर हैं एक दिल वालों के पास हैं । दूसरे तो वैसे ही कागज का दिल लिए बिना बात के खड़े हैं। उन के दिल में न तो किसी के लिए घृणा है और न ही इस दिल के लिए मरने मारने का जूनून है और न हो सर तन से जुड़ा करने के नारे हैं । पर दूसरे दिल वाले तो ऐसे नहीं है। उन के दिल में तो नफरत भी है और केवल नफरत ही नहीं मारने काटने और लूटने का जूनून भी है।
पर बात यह है कि जब दोनों दिल एक जैसे हैं तो एक के दिल में इतनी नफरत किस ने भर दी है। आखिर कोई कलाकार या डायरेक्टर तो ऐसा होगा जो इन के दिल में दूसरों के प्रति नफरत भर रहा है, जिस के कारण या जिस के निर्देश पर ये पत्थर तो दूसरों पर फेंक ही रहे हैं। इतना ही नहीं वे तो दुकानों को लूट रहे हैं, घरों में भी आग लगा रहे है, पुलिस पर आक्रमण कर रहे हैं और यहां तक की आम लोगों की हत्या तक कर रहे हैं।
अब सोचना तो यह है कि इन के दिल में ऐसा कैसे हो रहा है इन का दिल ऐसे २ कामों की गवाही कैसे दे रहा है आखिर कौन इन के दिमागों में बैठा रहा है कि लूटो मारो आग लगा दो। यह तो दिल की बात नहीं है यह तो दरिंदगी की बातें हैं ,वहशीपन की बातें हैं ,बर्बरता की बातें हैं ,पर ये है, क्योंकि ये सब सामने दिख रहीं हैं।
पर क्या ये देश द्रोह नहीं है कि देश के क़ानून को भी मत मानों पुलिस पर भी पत्थर फैंकों और फिर हठ धर्मी दिखाओं कि यह तो हम करेंगे ही बताओं हमारा कौन क्या कर लेगा। पर आखिर पुलिस तो पुलिस ही होती है और उस की जिम्मेदारी भी है कि वह कानून व्यवस्था बनाये रखे। पर जब कोई पुलिस पर हमला करेगा तो पुलिस को इस लिए थोड़ी रखा है कि वह चुपचाप मार खा ले। आप उस के चौकी और थानों को भी लूट लें और वह कुछ न कहे। पहले ऐसा होता था , पर अब वे जमाने चले गए। अब पुलिस अपना बचाव तो करेगी ही साथ ही क़ानून को हाथ में लेने वालों को सबक भी अच्छी तरह से सिखाएगी और जब ऐसा करेगी तो आप के जूते चप्पल आदि तो वहां छूट ही जाने है।
पर अब आप पुलिस पर बेतुके तरह तरह के आरोप लगाने लगेंगे और रोने पीटने का ऐसा नाटक करेंगे कि आप इन के झांसे में आराम से आ जाएँ। पर कुछ तथाकथित बुद्धिजीवी तो पहले से तैयार बैठे होते हैं जो इस काम के लिए ही हमेशा तैयार रहते हैं या वे ही तो इन्हे ऐसा करने को उकसाते हैं। वे तो यह सब करवाते ही इस लिए है कि उन्हें वे ज्यादा शोर मचाने का अवसर मिल जाये ताकि विदेशियों को भी हमारे देश को कोसने का मौका मिल जाये इतना ही नहीं वे इन दंगाइयों को भी कहेंगे कि ये तो बेचारे भटके हुए जवान हैं जिन पर बिना बात लठ्ठ बरसाए जा रहे हैं ,इन के साथ तो अन्याय हो रहा है ,ये तो बड़े शांति प्रिय और मासूम लोग हैं। वे इन के कारनामों को जैसे भी होगा छुपाने की कोशिश हर तरह से करेंगे। वे इन के लिए प्रेस कांफ्रेंस करेंगे, प्रेस वाले इन की झूठी बातों को भी प्रेस की स्वतंत्रता के नाम पर छाप देंगे। फिर ये लोग ही कोर्ट में भी चले जायेंगे और वहां पुलिस को अत्याचारी बता कर केस कर देंगे।
कैसे विडंबना है कि ये दिल का नाम ले कर खून खराबा भी करेंगे और हल्ला भी मचाएंगे। .हे इन को दिल देने वाले !तूने इन्हे क्या यही दिल दिया है जिस से तुझे ये प्यार का नाटक करते है। पर यह नाटक करने का फरमान भी तो किसी ने इन्हे सिखाया है या बताया है या पढ़ाया है।
पर सोचने की बात तो यह है कि आखिर इस खूनी दिल का इलाज क्या है। क्या यह इसी तरह की हरकतें करता रहेगा या कभी सुधरेगा भी। पर लगता है सुधरने की बात तो इस दिल में है ही नहीं क्योंकि इसे बनाया ही इस तरह का है।
— डॉ. वेद व्यथित
