एक नापाकी का दर्द
हज़ारों ख़्वाहिशें ऐसी कि हर ख्वाहिश पे दम निकले
बहुत निकले हमारे बल्लों से रन, फिर भी कम निकले
लग गई इस कदर लाइन हमारे बल्लेबाज़ों की
इधर पिच से वो निकला कि पैवेलियन से हम निकले
कुलदीप की फिरकी ने बनाया हमको घनचक्कर
हमने उनको ठंडा समझा था वो तो गरम निकले
दुबे-वर्मा के छक्कों ने उड़ा डाले होश अपने
आसमाँ ताकते हुए बॉलरों का दम निकले
तीनों बार दे डाली पटकनी हमको भारत ने
शर्मा ही क्या कम था कि अब वर्मा के बम निकले
खुद को दे रहे हैं अब तसल्ली सिर्फ़ ये कहकर
फ़ाइनल तुमने जीता मगर ट्रॉफ़ी लेकर हम निकले
— बीजू ब्रजवासी
आश्विन शु. ७, सं. २०८२ वि. (२९ सितम्बर २०२५)
