कविता
एक गमले से निकालकर
दूसरे गमले में लगा दी जाती हैं
उम्मीद की जाती है उनसे
भूल जाएं अपनी जड़ों को
बेटियों का कोई घर नहीं होता
उम्र भर तानों की गंगा में नहाती हैं
अपना घर बनाने की चाहत में
अक्सर हँसना भी भूल जाती हैं
कहना जरा आसान है उनको
ये हमारी बहू नहीं बेटी है
बेटी बाजार से आये थक जाती है
बहू को जिम्मेदारी सौंप दी जाती है
— वर्षा वार्ष्णेय
