गीतिका/ग़ज़ल

बेपर्दा हो रहे हैं अब

जो दामिनी पे दामन, सुखाने नही निकले
मुलम्मा नूर का कभी, दिखाने नही निकले
बेपर्दा हो रहे हैं अब, ओ आहिस्ते आहिस्ते
जो दहलीज पर दिया, जलाने नही निकले

फिरती रही हवाएँ यहाँ, घटा की तलाश में
बेचैन रही दिशाएँ सब, छटा की तलाश में
हर बज्म में अब ओ, नजर आने लगे यहाँ
जो बीमारी अपनी, बताने नही निकले

हवा कोई चली यहाँ, आईने लगे भाने
जो सरगम से अंजान थे, अब वो लगे गाने
नजरें बहुत इस “राज” की, उनकी तलाश में
जो कुंचे में कभी होली, मनाने नही निकले

राज कुमार तिवारी “राज”
बाराबंकी

राज कुमार तिवारी 'राज'

हिंदी से स्नातक एवं शिक्षा शास्त्र से परास्नातक , कविता एवं लेख लिखने का शौख, लखनऊ से प्रकाशित समाचार पत्र से लेकर कई पत्रिकाओं में स्थान प्राप्त कर तथा दूरदर्शन केंद्र लखनऊ से प्रकाशित पुस्तक दृष्टि सृष्टि में स्थान प्राप्त किया और अमर उजाला काव्य में भी सैकड़ों रचनाये पब्लिश की गयीं वर्तामन समय में जय विजय मासिक पत्रिका में सक्रियता के साथ साथ पंचायतीराज विभाग में कंप्यूटर आपरेटर के पदीय दायित्वों का निर्वहन किया जा रहा है निवास जनपद बाराबंकी उत्तर प्रदेश पिन २२५४१३ संपर्क सूत्र - 9984172782