बेपर्दा हो रहे हैं अब
जो दामिनी पे दामन, सुखाने नही निकले
मुलम्मा नूर का कभी, दिखाने नही निकले
बेपर्दा हो रहे हैं अब, ओ आहिस्ते आहिस्ते
जो दहलीज पर दिया, जलाने नही निकले
फिरती रही हवाएँ यहाँ, घटा की तलाश में
बेचैन रही दिशाएँ सब, छटा की तलाश में
हर बज्म में अब ओ, नजर आने लगे यहाँ
जो बीमारी अपनी, बताने नही निकले
हवा कोई चली यहाँ, आईने लगे भाने
जो सरगम से अंजान थे, अब वो लगे गाने
नजरें बहुत इस “राज” की, उनकी तलाश में
जो कुंचे में कभी होली, मनाने नही निकले
राज कुमार तिवारी “राज”
बाराबंकी
