अपने विचार
धार्मिक उन्माद है जोरो पर
मानवता की लाश पडी है सडको में !
दीमक लग रही है शिक्षा तंत्र में
युवा हो रहे है बेहाल बेरोजगारी में !
कैसा विष फैला है सियासत में
हुक्मरान लगे है हमें मिटाने में !
ये कैसे समय में जी रहे हम सभी
बेईमानी का गजब दौर है जमाने में !
इंसानियत शर्मसार हो रही यहां
दानवता लगी है पंख पसारने में !
नैतिकता उसूल सभी बेमानी हुए
कैसा गिरावट है इस जमाने में !
बाते तो सभी करते सच्चाई की
सच्चाई नहीं है किसी के किरदारो में !
हम कैसे बदले इस जमाने को
जब कोई सुधार नहीं अपने विचारो में !
— विभा कुमारी “नीरजा”
