अनपढ़ आंखें पूछती हैं
सड़कें सुनसान हैं
अनकहे सवाल बिखरे
नीर की बूँदें गिरें
हवा भी पूछती
कौन सुनता आवाज़ यहाँ
पथिक ठिठकता
सूरज ढलता है
छाया में छुपा सवाल
आँखें झुकती हैं
फूल भी कांपते
सूखी मिट्टी के गीत
अनकही कहानी
छोटे हाथ उठे
शिक्षा की चाह में
अनपढ़ आंखें
नीली छाँव में
सपनों का दरवाज़ा
खुलता कहाँ है
रास्ते गुमनाम
हर मोड़ पर इंतज़ार
अनकही पुकार
बारिश की बूँदें
खेलती हैं उनके सिर
अनकही आवाज़
किताबें बंद हैं
अक्षर भी सो गए यहाँ
आँखें रोती हैं
रात की चाँदनी
छू नहीं पाती दिल को
अनपढ़ आंखें
हवाएँ चलें भी
सन्देश नहीं पहुँचा पाईं
सन्नाटा बोले
छोटे कदम थकें
मंज़िल दूर लगी यहाँ
अनकहे सवाल
धूप ढलती है
पर आँखों की उम्मीद
अंधेरे में चमके
संगीत भी मौन
तन्हाई की गूँज में
अनपढ़ आंखें
पतझड़ की रात
सन्नाटा भी सहम जाए
शिक्षा की चाह
नीली घास पर
सपनों की छाया गिरे
अनकही कहानी
साँसों की लय में
गीत नहीं, बस पुकार
अनपढ़ आंखें
— डॉ. अशोक
