अब न बिगाड़ो
गीत मेरे क्यों,
बेसुरे से हो गए हैं,
साज वही, संगीत वही,
सुर भी वही हैं!
बोल मेरे क्यों,
अटपटे से हो गए हैं,
ताल वाही, उस्ताद वही,
राग भी वही हैं!
सरगम मेरे क्यों,
आगे पीछे हो गए हैं,
तानपूरा, शहनाई वही,
लय भी वही हैं!
जानता हूं जमीं पर,
पैर मेरे थम गए हैं,
थाप तबले की कट रही है,
जबकि रात थोड़ी बची है!
मैं आगाह करता हूं,
उस्ताद सुन लो कुछ भी हो,
ताल अपनी ही बजाओ,
थोड़ी बची है अब न बिगाड़ो!!
— डॉ. सतीश “बब्बा”
