लघु कथा – वीर रस का कवि
हेलो, जी मैं “अलाने” शहर से विकराल रूप झंझावात बोल रहा हूँ। क्या मैं “फलाने” शहर के कुपित कुमार अग्नि जी से बात कर रहा हूँ?
जी हाँ, मैं अग्नि ही बोल रहा हूँ। फ़रमाइए मैं क्या सेवा कर सकता हूँ आपकी?
अग्नि जी मुझे पता चला है कि आप अगले महीने एक वीर रस के कवि-सम्मेलन का आयोजन कर रहे हैं। मैं भी वीर रस का कवि हूँ। आपकी इनायत हो जाती तो मैं भी इसमें सम्मिलित हो जाता। आप चिंता न करें, आने-जाने की व्यवस्था मैं खुद कर लूँगा।
झंझावात जी, कृपया अपना प्रोफ़ाइल थोड़ा बताने का कष्ट करें। आप राष्ट्रीय कवि हैं या अंतर्राष्ट्रीय कवि, डाक्टर वग़ैरह लिखते हैं क्या, या कोई और उपाधि आपको प्राप्त है? कितनी जगह सम्मानित हुए हैं।
अग्नि जी, ऐसा तो कुछ नहीं है पर मैं बुलंद आवाज़ में जब कविता पढ़ता हूँ तो बच्चे डरकर माँ की गोद में छिप जाते हैं। आस- पास के घरों की खिड़कियाँ हिलने लगती हैं। एक मील दूर तक के लोगों को कविता सुनाई देती है और युवकों की भुजाएँ फड़कने लगती हैं। प्रायः कवि-सम्मेलन में लोग अपनी आस्तीनें चढ़ा लेते हैं। बहुत ही प्रभावशाली कवि हूँ जनाब।
वो तो ठीक है झंझावात जी, पर हमारे अपने शहर में ही अंतर्राष्ट्रीय कवियों का पूरा जमघट मौजूद है। चयन की बहुत ही मारामारी रहती है साहब। कोई मुक्तक बादशाह है, कोई गीतों का शहंशाह तो कोई ग़ज़लों का उस्ताद। वीर रस के तो ऐसे ऐसे धुरंधर हमारे पास हैं कि हमें बाहर झांकना ही नहीं पड़ता। उनकी कविता से युद्ध की रणभेरी बज उठती है। कुछ कवि तो पंडाल में शौर्य के रक्तिम दृश्य उपस्थित करने की गारंटी देते हैं। हम पर इतना दबाव होता है कि किसे बुलाएँ, किसे नहीं। आख़िर हमें इनके बीच ही रहना है। इनमें से कई तो हमारा आर्थिक सहयोग भी कर देते हैं। कईयों को तो हम खाली लिफ़ाफ़ा भी मानदेय के रूप में दे देते हैं।
अग्नि जी आप मुझे भी खाली लिफ़ाफ़ा दे दीजिएगा, बस मैं एक अवसर चाहता हूँ आपके शहर में।
देखिए मैं अकेला कुछ नहीं कर सकता। आप अपने क़ाव्य पाठ की एक वीडियो भेज दें। मैं आयोजन समिति से विचार करके ही बता सकूँगा, आप प्रतीक्षा कर लें।
झंझावात जी पंद्रह दिन से प्रतीक्षा कर रहे हैं।
— बृज राज किशोर ‘राहगीर’
