कविता

हां वो भूल रहा है

उनके पैदा होते ही खुश हुए लोग सारे,
अब उनके लिए भी गर्वित पल आया
जो थे पुत्र के मामले में बेचारे,
बूढ़े दादा जी तो लगभग पगला गया,
झूमते नाचते बच्चे के पास ननिहाल आ गया,
उनकी खुशी देखते बनती थी,
पल पल गर्व से छाती तनती थी,
क्योंकि बहुत सारे पैदा हुए
पुत्रों की मौत के बाद वो दुनिया में आया था,
बहुतों की निराश जिंदगी में खुशहाली लाया था,
उनके बाद कई भाई बहन
परिवार की खुशियां बढ़ाने आए,
मगर पहले पुत्र को गिरफ्त मेंप
ले चुके थे पराये पन के साये,
परायों ने उन्हें संभाला,
गाली दे खिलाते थे हर निवाला,
परिवार के संकट को अकेले ढोया,
और हर रिश्ते का रिश्ता मुफ्त में खोया,
हर रिश्ता खोने के बाद
अब वो भूलने लगा है अपने आप को,
अब नहीं सोचता अच्छाई या संताप को,
उनको अब कोई फर्क नहीं पड़ता
बचे हुए हैं कितने जिंदगी के दिन,
डसे घर,परिवार,खोखला वक्त या जिन।

— राजेन्द्र लाहिरी

राजेन्द्र लाहिरी

पामगढ़, जिला जांजगीर चाम्पा, छ. ग.495554