सामाजिक

आदमी मुसाफिर है, आता है जाता है

जीवन एक अनमोल यात्रा है जिसका कोई स्थायी ठिकाना नहीं होता, हम सब इसी यात्रा के मुसाफिर हैं जो इस संसार में आते हैं, यहाँ अपनी छाप छोड़ते हैं और एक दिन इस सफर से विदा ले जाते हैं। “आदमी मुसाफिर है, आता है जाता है, आते जाते रस्ते में यादें छोड़ जाता है” यह पंक्ति हमारी जिंदगी की अनित्य भूमिका को दर्शाती है जहाँ व्यक्ति के आने और जाने की प्रक्रिया एक सामान्य सत्य है, जो हमें जीवन की गहराई और अस्थिरता का बोध कराती है। जीवन के मार्ग में अनेक मुसाफिर मिलते हैं, अनेक अनुभव, यादें और शिकवे हम अपने साथ लेकर चलते हैं, और यह सभी हमारी पहचान और अस्तित्व का हिस्सा बन जाते हैं। इस सफर में कभी-कभी अकेला महसूस होना भी स्वाभाविक है, जैसे हवा का झोंका या पानी की बहती लहर होती है, जो अपने रास्ते पर चलती रहती है, पर फिर भी संघर्ष और विजय के बीच जीवन की नैया डोलती रहती है। हर किसी की अपनी कहानी, अपनी कसक, और अपने सुख-दुःख होते हैं जिन्हें वह अपने दिल के करीब रखता है, और यही जीवन को इतना जटिल, सुंदर और अर्थपूर्ण बनाता है। इस अस्तित्व की छोटी-छोटी खुशियाँ, असफलताएँ, मिलने-जुलने वाले लोग और उनके साथ जुड़े पल हमारी जिंदगी के सबसे कीमती रत्न हैं, जिन्हें हम संजोते हैं और जो हमारे अंदर गहरे भावनात्मक अनुभवों का सर्जन करते हैं। जीवन का यह सफर हमें यह भी सिखाता है कि चाहे जितनी भी परेशानियाँ आएं, यादें छूट जाएं, अकेलापन सताए, पर आशा की किरण कभी खत्म नहीं होती और हमें कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। इसलिए हमें चाहिए कि हम इस यात्रा को प्रेम, दया, और समझदारी के साथ जीएं, ताकि हमारे आने-जाने का प्रभाव हमारे आसपास के लोगों के दिलों में अमिट यादें छोड़ जाए। यही जीवन का फलसफा है,हर मुसाफिर अपनी मंजिल की ओर बढ़ता है, लेकिन उसकी राह में बाकी सबके लिए एक प्रेरणा और सीख बनकर रह जाता है। इस नजरिए से देखा जाए तो जीवन का संगीत और गीत हमारे भीतर छिपी उन भावनाओं को अभिव्यक्त करते हैं, जो शब्दों से परे हैं और सीधे दिल को छू जाते हैं, जैसे “आदमी मुसाफिर है” गीत ने हजारों दिलों को छुआ है और जीवन के सफर को एक नई दिशा दी है। यह गीत एक दार्शनिक संदेश देता है कि जीवन अनिश्चितताओं से भरा है, परंतु उन अनिश्चितताओं में भी जीवन का सुकून, प्रेम और संवेदना मौजूद है, जिन्हें समझ कर ही इंसान अपनी यात्रा को सार्थक बना सकता है। इसलिए, जीवन के इस सफर में हर इंसान को यह समझना चाहिए कि हम सब मुसाफिर हैं, जो आते-जाते रहते हैं, परन्तु हमें अपने आने और जाने के पीछे ऐसा प्रभाव छोड़ना चाहिए जो सदैव याद रखा जाए और हमारे संस्कारों और कर्मों से हमारा जीवन अमर हो जाए।

— डॉ. मुश्ताक अहमद शाह सहज

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।