कविता
सभ्यता के मुहाने पर
खड़ी है कुछ स्त्रियाँ
परंपरा की फटी- पुरानी
वेशभूषा धारण कर
अतित का हाथ थामे खड़ी है
वर्तमान को अस्वीकार करती
भविष्य का विरोध करती
बस खड़ी है यें स्त्रियाँ!!
समाज के अनुकूल
इन्हें आदर्शवादी कहा गया
और ये स्वयं को श्रेष्ठ
सर्व श्रेष्ठ बताती है!
मैं मानती हूँ इनको
कुपित और कुंठित
सब बेचारी है,
उदासियाँ सोख कर
क्षोभित है ये स्त्रियाँ
जीवन जिसे जिया जाना था
सुख जिसे भोगा जाना था
त्याग परित्याग की मूरत बन
जीवन को एक ओर ठेल आई
अनमनी सी खड़ी है यें स्त्रियाँ! !!
— निशा अविरल
