कविता
रात को दिन लिखूं
दर्द को खुशी लिखूं
खामोशी को आवाज लिखूं
बुरे लोगों को अच्छा लिखूं
खुशी को आंसू लिखूं
अंधेरे को उजाला लिखूं
प्यार को दर्द लिखूं
परायों को अपना लिखूं
दिल की दिमाग लिखूं
ऐसा लिखूं
जो कुछ मुमकिन ही नहीं हैं
तो कैसे लिखूं , झूठ को सच।
— गंगा मांझी
