ग़ज़ल
कज़ा की जानिब से पुकारे तो सभी जाएंगे
जो पैदा हुए हैं मारे तो सभी जाएंगे
रख के कब्र में तुझको वो घर को चल देंगे
तू बचेगा तनहा सहारे तो सभी जाएंगे
कहीं छुपा दूं चांद को कि बस अंधेरा हो
फिर उस के पीछे सितारे तो सभी जाएंगे
हो मां के हाथ में जब तक बिगड़ लो कितना भी
वक्त के हाथों सुधारे तो सभी जाएंगे
सभी मुसाफिर ए कश्ती हैं नाखुदा तो वो है
उस किनारे पे उतारे तो सभी जाएंगे
— भरत मल्होत्रा
