जग की शोभा पेड़-लताएँ
जग की शोभा पेड़ – लताएँ।
अधिकाधिक हम पेड़ उगाएँ।।
जहाँ पेड़ हों शांति समाए।
छाया मिले अतिथि ठहराए।।
रहते खग पशु भैंसें गायें।
जग की शोभा पेड़ – लताएँ।।
न हो अकाल न सूखा कोई।
धरा नहाए सजल भिगोई।।
देख छाँव मन खो – खो जाए।
जग की शोभा पेड़ – लताएँ।।
डाल – डाल पर बैंठे पक्षी।
वही हमारे नित अभिरक्षी।।
मधुर – मधुर फल हम सब खाएँ।
जग की शोभा पेड़- लताएँ।।
जहाँ पेड़ हों वर्षा होती।
झड़ें मेघ से जल के मोती।।
लगती हैं मनहर कविताएँ।
जग की शोभा पेड़ – लताएँ।।
चलो सड़क पर पौधे रोपें।
बातों की हम चला न तोपें।।
धरती को तरु से हरियाएँ।
जग की शोभा पेड़ – लताएँ।।
— डॉ. भगवत स्वरूप ‘शुभम’
