रच रहा है कोई साजिशें
न जाने ज़हर के बीज कब खत्म होंगे,
हम अपने ही घर में सुरक्षित कब होंगे,
कब खत्म होगी ये खौफ़नाक रंजिशें,
कोई कहीं न कहीं रच रहा हैं साजिशें ।
लूट लेते हैं सुकून सारा ऐसे ही समाचार,
पल में छीन ली जाती “आनंद” रसधार,
घर पर लौट पाएं हम सुरक्षित इस बार,
हर आदमी तो है बस परेशान व लाचार ।
इंसान ही इंसानों के लो बन बैठे हैं दुश्मन,
चीख रही मानवता कैसा बेतूका ये टशन,
खोखली हुई भावनाएं मना रहा कोई जश्न,
जीवन हैं कीमती रह गया बस एक प्रश्न ।
बस किताबी हो गए लगता हैं भाईचारे,
हम किसी न किसी रूप में फिर हैं हारे,
दुष्टों द्वारा तोड़ी जा रहीं प्रेम की दीवार,
न जाने कब थमेंगी ये हिंसा की तलवार ।
आस्तीन के सॉंप देशद्रोही वो दग़ाबाज़,
हादसों को अंजाम देते हैं वे धोखेबाज़,
बिलख रहा कोई अपना जल रहे अंगारे,
तड़प रहा है फिर कोई घूम रहे हत्यारे ।
बड़ी मात्रा में होता हैं बहुत ही नुक़सान,
कितने घर हो जाते सुनसान लहुलुहान,
समझने वाला हैं क्या कोई से दुरूहता,
ये समस्या बन चुकी हमारी विवशता ।
— मोनिका डागा “आनंद”
