गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

बढ़े हैं क़दम ही भी इधर धीरे- धीरे।
मिलेगी सुहानी अभी डगर धीरे-धीरे।।

करो प्यार दिल से निभाना ज़रूरी।
तभी हो रहेगा सफ़र धीरे-धीरे।।

लगें ठोकरें तो न पीछे हटो ही।
सहो दर्द का ही असर धीरे-धीरे।।

ज़माना कभी साथ देता नहीं है।
हटेगी उसी की नज़र धीरे-धीरे।।

कभी नींद आती तुम्हें ही नहीं है।
करेंगे सभी ही पहर धीरे-धीरे।।

चलो आशियाना बनाना हमें है।
बनेगा तभी देख घर धीरे-धीरे।।

अँधेरा रहे जो उदासी न लाना।
रहेगी अभी हो सहर धीरे-धीरे।।

ग़ज़लें कहो आज गाते चलो तुम।
( कटे ज़िंदगी का सफ़र धीरे-धीरे।। )

सुनो ज़ुल्म देखो अभी ढा रहे जो।
मिटेगा उन्हीं का क़हर धीरे-धीरे।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’