ग़ज़ल
परीशान करके वो अब पूछते हैं
उदासी का मेरी सबब पूछते हैं
छुपा कर वो अपनी सभी बातें मुझसे
मिरे दिल की बातें ग़ज़ब पूछते हैं
ये माना कि बातें अदब की हैं, लेकिन
वो होकर बड़े बेअदब पूछते हैं
गुज़रते हैं क्यों अब वो नज़रें चुराकर
हम उनसे नहीं, हमसे सब पूछते हैं
सियासी इदारे का सच भी यही है
ये मतलब निकल जाए, कब पूछते हैं
— डॉ पूनम माटिया
