कहानी

विदाई

छोटी सी बॅग में वह अपने जेवरात, कपडे, निजी सामान भर रही थी। आँखों से झर-झर आंसू बह रहे थे। मन पशोपश में था। जाऊं या न जाऊं? अब यहां और नहीं रहना। क्या वह अपने बल पर नहीं रह सकती? माना, कल वह कुछ ज्यादा ही कह गई थी। पता है उसे, सुजीत उसे बहुत प्यार करता है। दिलोजान से चाहता है। छोटीसी बात पर तू-तू मै-मैं हो गई। उसी वक्त माँ का फोन आया। रोते-रोते उसने मिर्च मसाला लगाकर आपबीती सुनाई। 

” माँ, मैं अब यहां नहीं रहूंगी। मर 

जाऊंगी मैं, पर मुझे नहीं रहना सुजीत के साथ।”

माँ ने सुनयना को तुरंत मायके बुला लिया। और वह झट से अपना घर छोडकर निकल पडी।

पीहर के द्वार पर न तो रौनक थी, न घर आँगन में चहकती चिडिया। उदासी ने जैसे चारों ओर से घेर लिया हो जैसे।

गुडिया गले मिलकर चली गई। मिंटू हाय कहकर चल पडा। माँ सबका खाना बनाने लगी। बाबुजी बाजार चले गये। 

अकेली बैठी वह सोच रही थी, क्या अपना घर छोडकर मैंने सही किया?

सुजीत की रह-रहकर याद आ रही थी। किसने उठाया होगा उसे? चाय बनानी भी तो नहीं आती उसे। तौलिया के लिए भी चिल्लाता रहा होगा। कैसे मैनेज किया होगा उसने। चिंता की गहरी खाई  में वह गोते खा रही थी। धीरे-धीरे अपनी गलती का अहसास हो रहा था उसे।

पश्चाताप से मन आप ही आपको कोस रहा था। सुजीत ने सुधा से प्यार की बात इमानदारी से उसे बताई तो थी और भरोसा भी दिलाया था, वह अब सिर्फ उसका है। क्यों वह ताने मार-मारकर कुरेदती रही उसके जख्म? बात-बात में उसे नीचा दिखाती रहती है?

सुजीत ने सिर्फ उसे अपना ध्यान रखने को कहा था। उसके बढते मोटापे की चिंता की थी। उसे कुछ पसंदीदा काम करने की सलाह दी थी। तुनककर वह उसे गलत समझ बैठी।

लालची, बेईमान ..न जाने कितना कुछ कह दिया उसने।

उपर से शोरगुल भी किया और वापिस न आने की धमकी देकर अपने पीहर आ गई। 

यहां आकर समझ पाई, सुजीत के साथ जिंदगी कितनी हसीन है।

सुजीत ने रोकने, समझाने की कोशिश भी की थी। पर अपनी खूबसूरती का दंभ कहो, या अहंकार वह अपनी रौ में बहती रही। चाहती वह भी थी उसे, परिवार को, उसके साथ को। पर उसके अतीत की छोटीसी भूल को अपना हथियार बनाकर उसे नीचा दिखाती रहती थी।

माँ बाबुजी कुछ नहीं कह रहे थे। इतना जरूर कहा, 

“बेटी बाबुल की अंगना से विदा होती है अपना घर बसाने के लिए। सपनों के राजकुमार के साथ नई दुनिया बसाने के लिए। 

संयम,सेवा, समर्पण, सहयोग, विश्वास की नींव पर आपना घरौंदा सजाती है। प्रेम, अनुराग से सबसे नाता जोडती है।”

” हम भी चाहते है हमारी बिटिया खुश रहे। फले, फूले।”

” सुजीत जैसे जमाई सौभाग्य से मिलते है।”

” सुनयना, अपनी जिद, अहंकार के कारण तुम तुनकती रही। पीहर के दरवाजे तुम्हारे लिए खुले है, पर ये घर अब तुम्हारा नहीं। बात बुरी लगेगी, पर सच को स्वीकार कर लो।”

माँ ने प्यार से समझाया। बाबुजी ने सर पर हाथ फेरा। वह फफक-फफककर रो पडी। सारे गिले शिकवे दूर हो गये। उसका जीवन के प्रति नजरिया बदल गया। 

” मुझे अपने घर जाना है।”

सामने सुजीत को देख वह दौड़कर आई।

उसकी बाहों में सिमटकर सुबक पडी।

” चलो, घर चलते है।”

हाथों में हाथ थाम दोनों ने माँ बाबुजी का चरण स्पर्श किया। बाबुजी के गले लगकर ऐसे रो पडी, जैसे आज उसकी विदाई हो रही हो।

*चंचल जैन

मुलुंड,मुंबई ४०००७८