कविता
कभी कभी दिल करता है
छोड़ दूँ वो सारी बंदिशें
जिनका न कोई रुआब है
बना दूँ कुछ नयी लकीरें
खींच दूँ कुछ नयी तस्वीरें
कोरे कागज पर बनीं कुछ
आड़ी तिरछी मनचाही
खत्म कर दूँ वो सदियों से
चली आ रही फरमाइशें
पर चाहकर भी बदलना
संभव कहाँ औरत के लिए
खरीदे हुए गुलाम अक्सर
ताउम्र चार कदम भी मर्जी
कब चला पाते हैं अपनी
बस चलते रहते हैं उन
अनजान पगडंडियों पर
एक दिन सूकून की तलाश में
— वर्षा वार्ष्णेय
