हास्य व्यंग्य

बाप न माई, हर बात में ए.आई.

आज कल इस पूरे ब्रह्मांड में एक की चीज़ सर्व शक्तिमान है वह है एआई यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस। अब जब की लोग खुद ही इतने इंट्लीजेट हो गए हैं। और ऊपर से उनको आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस भी मदद कर रहा है तो फिर तो सोने पे सुहागा हो गया है। अब कोई भी अब किसी भी बात के लिए किसी बड़े से किसी किस्म की राय या सलाह मशविरा नही लेता है। आखिर ले भी क्यूं? जब एआई उपलब्ध है 24 घंटे एक आज्ञाकारी बोतल के जिन की तरह।

हमारे ज़माने में जिन्न बोतल में होता था, आजकल मोबाइल में है—और ऊपर से मुफ्त! फर्क सिर्फ इतना कि जिन्न तीन इच्छाएँ पूरी करता था, ए.आई. तीन लाख कर देता है। एक समस्या के सौ सौ समाधान बताता है। ऐसे मे कौन सा समाधान चुने ये खुद एक समस्या हो जाती है। पहले मां लड़कियों को खाना बनाना सिखाती थी तो एक ही जुमला खूब बोला जाता था की बेटी आज तो मां से पूछ पूछ कर बना रही हो कल किस से पूछोगी । जब हम नही रहेगी पास में । और हम लड़कियां डर कर सोचते थे कि सच है खाना बनाना मां से सीख ही ले वरना कौन सिखाएगा। अब मेरी बेटी कहती हैं मां आप रहने दो मैं तो चैट जीपटी से पूछ कर आप से भी अच्छा बना लूगी।

कसम से इस मुवे चैट जीपीटी का नाम सुनकर तन बदन में आग लग जाती हैं। जिन किचन टिप्स के लिए या जिन रेसिपी या जिस भी घरेलू नुस्खे पर हम इतराते थे सहेली से मिन्नते करवा कर देते थे। अब ये कमबख्त चैट जी पी टी झट से बता दें रहा है।और तो और किसी से चुगली भी नही करता की फलानी ने ये चीज हमसे पूछी थी। हर बात हजम कर लेता है। एक हम हैं पूरे मोहल्ले में गा लेते थे की राजू की मम्मी को भटूरे फुलाने की ट्रिक हमने बताई और अब वो हमसे ही मुंह फूला कर बैठ गई है । इस ने अब दोपहर की पंचायत के सारे अवसर तक खत्म कर दिए हैं। सब कुछ कितना नीरस हो गया है इस कमबख्त की वजह से। अब सब लोग कुछ ना कुछ अपलोड या डाउनलोड करने में लगे हैं ।

वैसे देखा जाए तो पितु, मातु, सहायक स्वामी सखा तुम ही इक नाथ हमारे हो” ये पक्तियां आज के समय में एआई के संदर्भ में बिल्कुल ठीक बैठती हैं। जो न थकता है, न रूठता है, न छुट्टी मांगता है। आप पूछो— “खाना क्या बनाऊं?” वो रेसिपी दे देगा। आप कढ़ी बनाना पूछो तो पांच तरह की कढ़ी बनाना बता देगा आप खुद कन्फ्यूज हो जाएंगे कौन सी बनाएं। उसमे कितनी कैलोरी है खाने से क्या फायदा क्या नुकसान सब कुछ उड़ेल देगा।

वो आप के लिए किसी भी काम को करने का सौ तरीका भी बता देगा। कोई भी जानकारी आप उंगली के एक इशारे पर हाज़िर है। अब ज्ञानी इंसान इतना ज्ञान पा रहा है की पूछो मत। अब इंसान को सिर्फ़ एक चीज़ की कमी है — भावना की। बाकी दिमाग़, डेटा और जवाब — सब तो मिल ही रहे हैं! डर ये लग रहा है की जैसी संगत वैसा असर। अब दिन रात भाव हीन एआई के साथ रहने से मनुष्य भी भाव हीन हो रहा है। अब भावना , जज़्बात, रिश्तों में गर्माहट, सब मनुष्य की पूंछ की तरह गायब हो रहे हैं। डार्विन का सिद्धांत यहां भी लागू हो रहा है।

जैसे एआई आया है कही ए इ यानी आर्टिफिशियल इमोशंस ना आ जाए। हर चीज इतनी करीने से इतनी परफेक्शन से होने लगी कि अब लोग अनगढ़ को ही क्लासिक कहने लगे हैं। और वो कहते हैं ना आग है बराबर लगी हुई दोनो तरफ यानी नई पीढ़ी और बुजुर्ग सब इस एआई के जाल में फंसे हुए हैं। और अब तो हाल ये है कि — अब कौन किससे कम है! बच्चे न पूछें बाप माई, कहें एआई! और पलटवार में मां-बाप भी न कहें बेटा बेटा, दिन-रात रट लगाए — मेटा और मांगे “डेटा डेटा!” सबका ध्यान अब बस स्क्रीन पर है,

जहाँ रिश्ते नहीं, नेट स्पीड मापी जाती है! किसी को भुलाया नही जाता यादें डिलीट की जाती है। चिट्ठी नही चैट होता है। किसी को उसका वादा नही याद दिलाया जाता है स्क्रीन शॉट भेजा जाता है चैट का। नाराज नही होते है बस ब्लॉक किया जाता है। किसी की उपेक्षा नहीं होती है मैसेज सीन पर छोड़ा जाता है। अब इंसान भी एक भावहीन अति इंटेलिजेंट यंत्र बन गया है जिसका संगी साथी कोई दोस्त यार जैसा भावनात्मक प्राणी नही आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस है।

किंतु अंत में एक बात कहूंगी एआई कितना भी जानकर क्यूं ना हो आज भी बेटे का मुंह देख सिर्फ उसकी आई या माई ही बता सकती है की बेटा भूखा है या कुछ परेशान हैं ना कि एआई। अतः मां बाप की सलाह सुने । उनके साथ उनके अनुभव का आनंद लें। और भावपूर्ण रहे भावनाहीन होने से बचें।

— प्रज्ञा पांडेय मनु

प्रज्ञा पांडे

वापी़, गुजरात