गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

हाथ से पकड़ा, उठाया रख दिया,
दिल ज़रा दिल से लगाया रख दिया।

सिर्फ ये सांई के बस की बात थी,
दीप पानी से जलाया रख दिया।

मेरे अरमानों का वो जलता शहर,
फूंक मारी और बुझाया रख दिया।

ख़्वाब मेरा नम हुआ था रात में,
दिन ने आकर के सुखाया रख दिया।

क्या पता उसने मेरा क्या सोचकर,
दिल पतंगों सा उड़ाया रख दिया।

खूब जिनको अपना ‘जय’ कहते रहे,
सबने तुझको कर पराया रख दिया।

— जयकृष्ण चांडक ‘जय’

*जयकृष्ण चाँडक 'जय'

हरदा म. प्र. से