ग़ज़ल
चोट वाला निढाल मिलता है
दूसरे को उछाल मिलता है
सब बमों में ज़फ़ा-दग़ाओं के
प्यार का इस्तमाल मिलता है
मैं इसी इन्तज़ार में रहता
कब हमारा ख़याल मिलता है
हुस्न की इक नज़र पड़ी जिस पर
हो गया वो निहाल मिलता है
कर लिया इन्तज़ार पकने का
इक न फल डाल-डाल मिलता है
ये ग़नीमत कि आज अपनों का
ग़ैर से हाल-चाल मिलता है
ख़्वाब अब तक न हो सका पूरा
साल के बाद साल मिलता है
— केशव शरण
