ग़ज़ल
दिल में उमड़ा अब तो एक समुंदर देखा।
रोज़ होता अब झगड़ा सुन घर-घर देखा।।
नौकरी की जब-तब खोज में निकले घर से।
आज आते ही पसीने से तर-ब-तर देखा।।
हो परेशां ही मुहब्बत से किनारा करते।
आज तन्हा उनके मुँह पर इक डर देखा।।
राह चलते हर मुसीबत को ही मारी ठोकर।
आज उसको ही तो घूमते दर-दर देखा।।
प्यार करना तो गुनाह होता नहीं है सुन लो।
क्या करें पर उसे हमने फटीचर देखा।।
ज़िंदगी तो लगती बेमानी है जीना अब।
हो गया खूब असर जो अब दिल पर देखा।।
दर्द लेकर ही गया आज हमारा ज़िद्दी।
सोच ऐसा हमने एक हमसफ़र देखा।।
आज सँवरा वो रवानी उस पर जो आयी।
हमने ख़ुद अपनी निगाहों से वो मंज़र देखा।
रोज़ काँटों से भरी ही मिलती हैं राहें।
साफ़ कर दीं उसने चलते अब डगर देखा।।
— रवि रश्मि ‘अनुभूति’
