गीता
आपका अंतर से आभार दिया है एक अनुपम दिव्य उपहार
उसका जीवन हुआ सार्थक जिसने समझा गीता का सार
गीता में श्री कृष्ण ने कहा जीवन का है छोर मरण
मानव की दिशा दशा क्या है बतलाता है उसका आचरण
लोभ मोह मद और वासना पूरे पथ में बाधाएं
वह ज्ञानी है जननायक है इसी सोच का है संचरण
फ़ंसा हुआ है मकड़ जाल में बाहर निकल नहीं पाता
सारी छद्म कामनाओं की इच्छाओं का है आवरण
नियति के हाथों की कठपुतलियां अपना नाच दिखाती हैं
काल का कौशल गजब कि जिसने बना दिया है जन्म मरण
धरा पर आना जीवन जीना और खामोश चले जाना
शाश्वत सत्य की राह अलौकिक जिसे चाहिए करना वरण
मैं दिनकर का आलोक प्रखर मैं नभ अच्छादित नव विहान
सारे जग को देने आया मैं फिर गीता का दिव्य ज्ञान
मैं सकल विश्व में भारत की पहचान बनाने आया हूं
मैं कविता पढ़ने नहीं चेतना दबी जगाने आया हूं
— डॉक्टर इंजीनियर मनोज श्रीवास्तव
