कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
कोहरे की चादर में लिपटी रात
रजाई में दुबके से जज़्बात मैं सुनूं
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
नदी का किनारा
ऊंचे ऊंचे दरख़्तों की कतार
रेत पर बैठ कर चांद को देखकर
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
ऊंचे पहाड़ों का सफर
तुम्हारा रास्ता दिखाना
मेरा हाथ थाम कर चलना
मुस्कुराकर देखना
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
गांव में सरसों के खेत
जहां तक नजर जाती
पीले फूलों की चादर
गर्म सरसों साग संग में
गर्म रोटी खाते हुए
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
कहीं दूर बांसुरी की आवाज
उस अदृश्य शक्ति का एहसास
कहने को शब्द ही नहीं
मोन तुम मोन मैं ,पहले
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें
— अर्विना गहलोत
