कविता

कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

कोहरे की चादर में लिपटी रात
रजाई में दुबके से जज़्बात मैं सुनूं
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

नदी का किनारा
ऊंचे ऊंचे दरख़्तों की कतार
रेत पर बैठ कर चांद को देखकर
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

ऊंचे पहाड़ों का सफर
तुम्हारा रास्ता दिखाना
मेरा हाथ थाम कर चलना
मुस्कुराकर देखना
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

गांव में सरसों के खेत
जहां तक नजर जाती
पीले फूलों की चादर
गर्म सरसों साग संग में
गर्म रोटी खाते हुए
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

कहीं दूर बांसुरी की आवाज
उस अदृश्य शक्ति का एहसास
कहने को शब्द ही नहीं
मोन तुम मोन मैं ,पहले
कुछ तुम कहो कुछ हम कहें

— अर्विना गहलोत

अर्विना गहलोत

जन्मतिथि-1969 पता D9 सृजन विहार एनटीपीसी मेजा पोस्ट कोडहर जिला प्रयागराज पिनकोड 212301 शिक्षा-एम एस सी वनस्पति विज्ञान वैद्य विशारद सामाजिक क्षेत्र- वेलफेयर विधा -स्वतंत्र मोबाइल/व्हाट्स ऐप - 9958312905 ashisharpit01@gmail.com प्रकाशन-दी कोर ,क्राइम आप नेशन, घरौंदा, साहित्य समीर प्रेरणा अंशु साहित्य समीर नई सदी की धमक , दृष्टी, शैल पुत्र ,परिदै बोलते है भाषा सहोदरी महिला विशेषांक, संगिनी, अनूभूती ,, सेतु अंतरराष्ट्रीय पत्रिका समाचार पत्र हरिभूमि ,समज्ञा डाटला ,ट्र टाईम्स दिन प्रतिदिन, सुबह सवेरे, साश्वत सृजन,लोक जंग अंतरा शब्द शक्ति, खबर वाहक ,गहमरी अचिंत्य साहित्य डेली मेट्रो वर्तमान अंकुर नोएडा, अमर उजाला डीएनस दैनिक न्याय सेतु