जीना चाहता हूँ
सबकी जरूरत से ज्यादा परवाह की,
अपनी चाहतों की एक धार बलि दी,
परवाह मुझ पर बहुत ज्यादा हावी हो गई,
जिंदगी की मिठास कहीं एकदम खो गई ।
अपने को यूँ गुमसुम कर भूलता चला गया,
अधूरापन जीवन का बढ़ता ही चला गया,
दुनिया की हाजरी लगाते लगाते अब थक गया,
जीवन का अधिकांश वक्त रेत की तरह फिसल गया ।
ऐ जिंदगी ! अब मुझ पर तू थोड़ा तो रहम कर,
इतना अब और न ज्यादा सुन सितम कर,
चाहे रूठे भले मुझसे अब ये जमाना सारा,
या बेरूखी देख मेरी कर ले मुझसे कोई किनारा ।
मैं थोड़ा सा बेपरवाह होना अब चाहता हूँ,
जिंदगी को जिंदादिली से जीना चाहता हूँ,
तलाश खुद की खुद में करना चाहता हूँ,
मौत के वक्त जी भरकर मुस्कुराना चाहता हूँ ।
पंखों को खोल आसमान में फड़फड़ाना चाहता हूँ,
मुरझाए जीवन पुष्प को फिर से खिलाना चाहता हूँ,
अंतर्मन के अनंत ष्आनंदष् को जागना चाहता हूँ ,
ऐ जिंदगी ! तुझे प्यार से गले लगाना चाहता हूँ।
— मोनिका डागा
