गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मोहब्बत के जज़्बात लिखूँ
या तेरा नाम हर बात लिखूँ

तू ग़ैर हो भी जाए कभी
मैं तुझे फिर भी क्यों हर रात लिखूँ

तेरी यादों में डूबा रहता हूँ मैं
अब अपने लिए कौन सी राहत लिखूँ

तू ही समझ पाएगा मेरी ख़ामोशी
वरना किसे ये दिल की आहट लिखूँ

तेरे होने से ही है रौशन सफर
अब किसके लिए कोई नई शुरुआत लिखूँ

तेरे जाने का डर भी तुझी से कहूँ
और तेरे आने को कैसी सौगात लिखूँ

जब मोहब्बत तुझ से ही मुकम्मल है
फिर किसे नई चाहत या आस लिखूँ

— हेमंत सिंह कुशवाह

हेमंत सिंह कुशवाह

राज्य प्रभारी मध्यप्रदेश विकलांग बल मोबा. 9074481685