उदासी भरे दिन कब ढलेंगे
सांझ की चुप में
थके पत्तों की सरसराहट—
दिल का बोझ उतरता।
टूटी किरणें भी
नए सवेरे का वादा
धीमे से दोहरातीं।
बंद खिड़कियों पर
आशा दस्तक देती है—
रात कहीं पिघलती।
धुंधले लम्हों में
एक मुस्कान उग आती—
वक्त नया सँवरता।
— डॉ अशोक
सांझ की चुप में
थके पत्तों की सरसराहट—
दिल का बोझ उतरता।
टूटी किरणें भी
नए सवेरे का वादा
धीमे से दोहरातीं।
बंद खिड़कियों पर
आशा दस्तक देती है—
रात कहीं पिघलती।
धुंधले लम्हों में
एक मुस्कान उग आती—
वक्त नया सँवरता।
— डॉ अशोक