तेरी यादों का दर्द
तेरी यादों का मौसम भी कुछ अजीब आया है,
बिन तेरे ये दिल कुछ ज़्यादा ही भरमाया है।
खूबसूरत चाँदनी रातें पूछ रहीं हैं बार-बार मुझसे,
तेरे बिना किस बात पर आज आसमाँ मुस्कराया है?
जुदाई के सफ़र में हर मोड़ सूना-सूना लगता है,
तेरे बिना हर मंज़र धुंधला, वीराना सा लगता है।
कभी जो कदम-कदम पर साथ थी तुम मेरे,
आज तेरी ही तरफ़ जाने को हर रास्ता बेगाना लगता है।
हवा भी अब तेरी खुशबू संग नहीं आती कभी,
यहाँ हर साँस तेरी कमी में ख़ुद से ही लड़ जाती है।
दिल के हर कोने के आईने में बस तेरा ही चेहरा है,
पर आँखों की नमी उसे हर रोज़ ही धुंधला जाती है।
रातें अब चुपचाप उतर आती हैं खिड़की पर,
तारों की महफ़िलें भी तन्हा-तन्हा लगती हैं।
नींद से पहले तू हर पल बहुत याद आता है,
और नींद के बाद भी तेरी ही कमी खलती रहती है।
कुछ बातें थीं जो कह न सके हम तुमसे,
कुछ बातें थीं जो छुप के भी कह दीं हमने ख़ुद से।
अब उन सबका बोझ लिए फिरते रहते हैं हम,
तेरी खामोशी भी जैसे बोलती है तेरे दिल से।
जुदाई का ये अनकहा मौसम अब थमता ही नहीं,
समय का हर खाली क़तरा भी रुकता ही नहीं।
पर हमने भी सीख लिया है अब बिना कहे जीना,
कि जो भी हो, सच्ची मोहब्बत कभी मरती नहीं।
तुम दूर सही, पर दिल में बसे हो ऐसे,
जैसे हवाओं में खुशबू, बरसात में बादल वैसे।
तुम्हारी कमी ने हमें दर्द के साथ जीना सिखा दिया,
जुदाई ने मोहब्बत को और भी गहरा कर दिया।
किसी दिन अगर ये दूरी अचानक पिघल जाए,
वक़्त की सारी गलतफ़हमियाँ चुपचाप सँभल जाएँ,
तो मैं फिर से तेरा नाम लूँगा बहुत हौसले से,
और तुम कह देना “मैं लौट आई हूँ चलो घर चलें।”
— रूपेश कुमार
