स्मिता पाटिल,अभिनय की अनंत गहराई

स्मिता पाटिल का अभिनय भारतीय सिनेमा के इतिहास में एक ऐसा अध्याय है जो यथार्थवाद, संवेदनशीलता और स्त्री-संघर्ष की अनकही कहानियों को अमिट रूप से अंकित करता है। मात्र 10 वर्षों के छोटे से सफ़र में उन्होंने समानांतर और मुख्यधारा दोनों सिनेमाओं को समृद्ध किया, जहाँ उनकी हर भूमिका सामाजिक चेतना का आईना बनती थी। यथार्थवाद की अनुपम कला,
स्मिता का अभिनय कभी बनावटी या अतिरंजित नहीं होता था,वे पर्दे पर आम भारतीय स्त्री की तरह सांस लेतीं, रोतीं और विद्रोह करतीं। ‘भूमिका’ में उर्मिला तात्या की आंतरिक कलह को आँखों के कोने से छलकते आँसूओं ने इतना जीवंत किया कि दर्शक खुद को उसके दर्पण में देखने लगे। इसी तरह ‘चक्र’ की विद्रोही ललिता में उनकी तीव्र नजरें पितृसत्तात्मक बंधनों को चीरती हुईं प्रतीत होती थीं।
उनकी यह सहजता बिना किसी औपचारिक प्रशिक्षण से उपजी थी, जो दूरदर्शन की न्यूज रीडर वाली सादगी से सिनेमा तक फैली। आलोचकों ने इसे “भावाभिनय का जादू” कहा, जहाँ चेहरे के सूक्ष्म हावभाव हजार शब्दों से अधिक बोलते थे। स्त्री-संघर्ष का प्रतीकस्मिता ने हमेशा जटिल, प्रतिरोधी स्त्री-पात्र चुने जो नैतिक द्वंद्वों से जूझतीं। ‘मंडी’ की सोंध्या में वेश्या की गरिमा, ‘अर्थ’ की पूजा में वैवाहिक संकट और ‘मिर्च मसाला’ की सब्जी में सामूहिक विद्रोह,हर किरदार ने नारीवादी दृष्टिकोण को मजबूत किया। उन्होंने ‘सेक्स सिंबल’ की चकाचौंध को ठुकराकर सोचने वाली, निर्णय लेने वाली स्त्री की छवि गढ़ी।
पद्मश्री और चार राष्ट्रीय पुरस्कार इसकी गवाही देते हैं, जो उनके 80 से अधिक फिल्मों के व्यापक दायरे को रेखांकित करते हैं। कैमरे से अनोखा संवाद कई निर्देशकों का मानना था कि कैमरा स्मिता को “चुन” लेता था; फ्रेम में वे बिना प्रयास के केंद्रबिंदु बन जातीं। ‘अर्धसत्य’ के मौन दृश्यों या ‘बाजार’ की तीव्रता में उनकी मौन अभिव्यक्ति दर्शक के मन में लंबे समय तक गूंजती रहती। व्यावसायिक फिल्मों जैसे ‘दर्द का रिश्ता’ में भी वे स्वाभाविक बनी रहीं, जो उनकी रेंज की पुष्टि करता है।
31 वर्ष की अल्पायु में 13 दिसंबर 1986 को उनकी विदाई ने सिनेमा को एक अपूरणीय क्षति दी, किंतु उनकी विरासत आज भी नई पीढ़ी को प्रेरित करती है।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
