भाषा-साहित्य

किताबों में बंद कहानियाँ हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक विकास का आधार हैं

किताबें केवल काग़ज़ के पन्नों का ढेर नहीं होतीं। ये मानव के सदियों पुराने अनुभव, ज्ञान, आशाएँ और आँसुओं का अमूल्य संग्रह होती हैं। कहानियाँ वास्तव में हमारी संस्कृति, सभ्यता और सोच की दर्पण होती हैं। जब हम कहानियों को अपनाते हैं, तो हम अपने अतीत की आवाज़ और भविष्य की रौशनी से जुड़ते हैं। लेकिन जब हम इन्हे छोड़ देते हैं, तो हम अपनी पहचान, अपनी विरासत और अपनी सच्चाई से कट जाते हैं।

कहानियाँ क्यों ज़रूरी हैं?

1. पहचान और परिवार से जुड़ाव।

कहानियाँ हमें हमारी असली पहचान से जोड़ती हैं। यह हमारे पूर्वजों के संघर्ष, रीति-रिवाज और मूल्यों को सहेजकर, पीढ़ियों के बीच पुल का काम करती हैं।

2. ज्ञान और अनुभव का आदान-प्रदान।

खाली बातों की जगह कहानियों के ज़रिये सीखना आसान और असरदार होता है। इनमें ज्ञान और नैतिकता प्राकृतिक ढंग से समाहित होती हैं।

3. कल्पना और सृजन।

जब हम कहानियाँ पढ़ते या सुनते हैं, तो हमारा मन नए-नए संसारों की रचना करता है, समस्याओं के नए समाधान खोजता है और जीवन के अनगिनत रंग खोजता है।

4. समझ और संवेदना।

दूसरों के अनुभवों, संघर्षों और सपनों से अवगत होकर हमारे भीतर करुणा विकसित होती है। यही भावना समाज को मानवता से जोड़ती है।

कहानियाँ छोड़ देना, क्या खो बैठते हैं?

कहानियाँ पढ़ना या सुनना बंद करने का अर्थ सिर्फ किताबें बंद करना नहीं है, बल्कि, अपनी जड़ों से कट जाना, सामाजिक और नैतिक मूल्यों को भूल जाना, कल्पना और रचनात्मकता की शक्ति को खो देना, भिन्न संस्कृतियों और विचारों से अनजान रह जाना और इस तरह सामाजिक चेतना में गिरावट आ जाना

हम क्या कर सकते हैं?

कहानियों को अपने और अपने बच्चों के जीवन में शामिल करें।

परिवार और मित्रों के साथ कहानियाँ साझा करें; अपने अनुभव सुनाएँ, दूसरों की कहानियाँ सुनें।

नई किताबें पढ़ें और पुरानी, अर्थपूर्ण कहानियों को ज़िंदा रखें।

कहानियों से मिले सबक को अपने हर रोज़ के निर्णयों और व्यवहार में लाएँ।

कहानी सिर्फ़ शब्द नहीं होती, वह सपना होती है, सबक होती है, भावना होती है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक चलने वाली विरासत होती है। किताबों में बंद कहानियाँ हमारे सामाजिक, सांस्कृतिक और मानसिक विकास का आधार हैं। इन्हें पढ़ना, बाँटना और समझना ,खुद से जुड़ने और समाज से जुड़े रहने का सबसे सहज और सुंदर तरीका है।

कहानियाँ जीवन हैं,  इनसे जितना जुड़ते जाएँगे, उतना ही अपनी असल पहचान, सभ्यता और चेतना से भी जुड़ते जाएँगे।

— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह 

डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह

पिता का नाम: अशफ़ाक़ अहमद शाह जन्मतिथि: 24 जून जन्मस्थान: ग्राम बलड़ी, तहसील हरसूद, जिला खंडवा, मध्य प्रदेश कर्मभूमि: हरदा, मध्य प्रदेश स्थायी पता: मगरधा, जिला हरदा, पिन 461335 संपर्क: मोबाइल: 9993901625 ईमेल: dr.m.a.shaholo2@gmail.com शैक्षिक योग्यता एवं व्यवसाय शिक्षा,B.N.Y.S.बैचलर ऑफ़ नेचुरोपैथी एंड योगिक साइंस. बी.कॉम, एम.कॉम बी.एड. फार्मासिस्ट आयुर्वेद रत्न, सी.सी.एच. व्यवसाय: फार्मासिस्ट, भाषाई दक्षता एवं रुचियाँ भाषाएँ, हिंदी, उर्दू, अंग्रेज़ी रुचियाँ, गीत, ग़ज़ल एवं सामयिक लेखन अध्ययन एवं ज्ञानार्जन साहित्यिक परिवेश में रहना वालिद (पिता) से प्रेरित होकर ग़ज़ल लेखन पूर्व पद एवं सामाजिक योगदान, पूर्व प्राचार्य, ज्ञानदीप हाई स्कूल, मगरधा पूर्व प्रधान पाठक, उर्दू माध्यमिक शाला, बलड़ी ग्रामीण विकास विस्तार अधिकारी, बलड़ी कम्युनिटी हेल्थ वर्कर, मगरधा साहित्यिक यात्रा लेखन का अनुभव: 30 वर्षों से निरंतर लेखन प्रकाशित रचनाएँ: 2000+ कविताएँ, ग़ज़लें, सामयिक लेख प्रकाशन, निरन्तर, द ग्राम टू डे, दी वूमंस एक्सप्रेस, एजुकेशनल समाचार पत्र (पटना), संस्कार धनी (जबलपुर),जबलपुर दर्पण, सुबह प्रकाश , दैनिक दोपहर,संस्कार न्यूज,नई रोशनी समाचार पत्र,परिवहन विशेष,समाचार पत्र, घटती घटना समाचार पत्र,कोल फील्ड मिरर (पश्चिम बंगाल), अनोख तीर (हरदा), दक्सिन समाचार पत्र, नगसर संवाद, नगर कथा साप्ताहिक (इटारसी) दैनिक भास्कर, नवदुनिया, चौथा संसार, दैनिक जागरण, मंथन (बुरहानपुर), कोरकू देशम (टिमरनी) में स्थायी कॉलम अन्य कई पत्र-पत्रिकाओं में निरंतर रचनाएँ प्रकाशित प्रकाशित पुस्तकें एवं साझा संग्रह साझा संग्रह (प्रमुख), मधुमालती, कोविड, काव्य ज्योति, जहाँ न पहुँचे रवि, दोहा ज्योति, गुलसितां, 21वीं सदी के 11 कवि, काव्य दर्पण, जहाँ न पहुँचे कवि (रवीना प्रकाशन) उर्विल, स्वर्णाभ, अमल तास, गुलमोहर, मेरी क़लम से, मेरी अनुभूति, मेरी अभिव्यक्ति, बेटियां, कोहिनूर, कविता बोलती है, हिंदी हैं हम, क़लम का कमाल, शब्द मेरे, तिरंगा ऊंचा रहे हमारा (मधुशाला प्रकाशन) अल्फ़ाज़ शब्दों का पिटारा, तहरीरें कुछ सुलझी कुछ न अनसुलझी (जील इन फिक्स पब्लिकेशन) व्यक्तिगत ग़ज़ल संग्रह: तुम भुलाये क्यों नहीं जाते तेरी नाराज़गी और मेरी ग़ज़लें तेरा इंतज़ार आज भी है (नवीनतम) पाँच नए ग़ज़ल संग्रह प्रकाशनाधीन सम्मान एवं पुरस्कार साहित्यिक योगदान के लिए अनेक सम्मान एवं पुरस्कार प्राप्त पाठकों का स्नेह, साहित्यिक मंचों से मान्यता मुश्ताक़ अहमद शाह जी का साहित्यिक और सामाजिक योगदान न केवल मध्य प्रदेश, बल्कि पूरे हिंदी-उर्दू साहित्य जगत के लिए गर्व का विषय है। आपकी लेखनी ने समाज को संवेदनशीलता, प्रेम और मानवीय मूल्यों से जोड़ा है। आपके द्वारा रचित ग़ज़लें और कविताएँ आज भी पाठकों के मन को छूती हैं और साहित्य को नई दिशा देती हैं।