जाति और क़ौम की पहचान को नकारिए नहीं
जातिवाद और क़ौमवाद आज के भारतीय समाज के सामने खड़ी सबसे गंभीर चुनौतियों में से एक हैं। सवाल यह है कि क्या हम जाति, बिरादरी या किसी एक क़ौम के नाम पर संगठन बनाकर या बनाने की बातें करके पूरे समाज को अलग-अलग खांचों में बांटकर स्वयं को कमज़ोर नहीं कर रहे हैं? क्या विकास का सपना हम सब मिलकर, एक समाज के रूप में देखना चाहते हैं या केवल अपनी विशेष क़ौम, जाति या बिरादरी के दायरे में सिमटकर अपने आपको बाक़ी समाज से अलग कर रहे हैं? सच्चाई यह है कि आज के जटिल सामाजिक और आर्थिक ढांचे में कोई भी एक जाति या क़ौम इतनी सक्षम नहीं है कि वह दूसरी क़ौमों से पूरी तरह बेनियाज़ रहकर जी सके,शिक्षा, रोज़गार, व्यापार, स्वास्थ्य, सुरक्षा हर क्षेत्र में हम एक-दूसरे पर निर्भर हैं। फ़िर यह अलगाववादी सोच कहां से आती है और कौन लोग हैं जो ऐसी बातों को लोगों के दिमाग़ में भरकर समाज का विभाजन करते हैं और इस विभाजन की राजनीति को सीढ़ी बनाकर ख़ुद को नेता बनाने की कोशिश करते हैं? इन्हीं चंद ख़ुदपरस्त लोगों की जातीय मुफ़ाद पर आधारित राजनीति को समझना आज हर ज़िम्मेदार नागरिक की ज़िम्मेदारी है। भारतीय इतिहास गवाह है कि जब-जब समाज आपस में बंटा, कमज़ोर हुआ और बाहरी ताक़तों ने इसका फ़ायदा उठाया। अंग्रेजों की ‘फ़ुट डालो और राज करो’ की नीति ने हमारी राजनीतिक स्वतंत्रता ही नहीं छीनी, बल्कि जाति और सम्प्रदाय आधारित अविश्वास को गहराई तक पहुंचा दिया। आज़ादी के बाद उम्मीद थी कि हम इस विरासत से मुक्त होंगे, लेकिन दुर्भाग्य से स्वार्थी राजनीतिक समूहों ने उसी फ़ार्मूले को नए चेहरों और नए नारों के साथ आगे बढ़ाया। आज कई जगह जाति, बिरादरी या क़ौम के नाम पर बने संगठन और क्षेत्रीय दल समाज को जोड़ने के बजाय उसे लगातार टुकड़ों में बांटने का काम कर रहे हैं। वोट बैंक की राजनीति ने ‘नागरिक’ की पहचान को पीछे धकेलकर ‘जाति’ और ‘कौम’ की पहचान को आगे कर दिया है, मानो इंसान की योग्यता और अधिकार का पैमाना उसकी मेहनत या चरित्र नहीं, बल्कि उसकी जाति हो। विडम्बना यह है कि जो नेता जातीय अस्मिता के नाम पर ख़ुद को मसीहा के रूप में पेश करते हैं, वे असल में उसी जाति को स्थायी रूप से पिछड़ा और निर्भर बनाए रखने की राजनीति करते हैं। वे लोगों के मन में यह डर बैठाते हैं कि अगर वे ख़ुद को बाक़ी समाज से अलग नहीं रखेंगे, तो उनका हक़ छिन जाएगा। जबकि वास्तविकता इसके उलट है,अलगाव जितना बढ़ेगा, विकास के अवसर उतने ही घटेंगे। विश्व और देश के अनेक अध्ययन यह दिखाते हैं कि जिन समाजों में आपसी विश्वास, सामाजिक सौहार्द और साझा पहचान मजबूत होती है, वहां आर्थिक प्रगति, शिक्षा का स्तर और जीवन की गुणवत्ता अधिक होती है, इसके विपरीत जहां समाज जातीय, धार्मिक या क़ौमी आधार पर बुरी तरह बंटा होता है, वहां हिंसा, बेरोज़गारी, भ्रष्टाचार और ग़रीबी अधिक पनपती है। सवाल फिर वही है—क्या कोई भी एक जाति या क़ौम, अपने दम पर, बिना दूसरी क़ौमों के सहयोग के, विकास की संपूर्ण यात्रा तय कर सकती है? उत्तर साफ़ है,नहीं। एक किसान को मंडी, व्यापारी और तकनीक की जरूरत होती है; एक डॉक्टर, इंजीनियर, शिक्षक, मज़दूर, दुकानदार,सब एक-दूसरे से सेवाएं लेते और देते हैं। यह परस्पर निर्भरता ही आधुनिक समाज की रीढ़ है। ऐसे में जो लोग यह भ्रम फै़लाते हैं कि ‘हमारी क़ौम अलग, हमारा संघर्ष अलग, हमारा विकास बाकी से अलग’ वे न तो समाज का भला चाहते हैं, न ही वास्तव में अपनी क़ौम का। वे बस जातीय भावनाओं को भड़का कर तात्कालिक राजनीतिक लाभ उठाना चाहते हैं। जातिवाद और क़ौम वाद का सबसे ख़तरनाक पहलू यह है कि यह आम आदमी के दिमाग़ में यह ज़हर भर देता है कि दूसरा इंसान, केवल इसलिए कि वह दूसरी जाति या क़ौम से है, उसका प्रतिद्वंद्वी या दुश्मन है। इस मानसिकता के कारण सामान्य सामाजिक समस्याएं भी सामूहिक संवाद से हल होने के बजाय टकराव में बदल जाती हैं। नौकरी, आरक्षण, संसाधन और प्रतिनिधित्व जैसे वैध सवालों को कुछ तत्व इस तरह पेश करते हैं कि मानो यह एक जाति बनाम दूसरी जाति की जंग हो, जबकि असली लड़ाई होनी चाहिए अवसरों के न्यायपूर्ण और पारदर्शी बंटवारे के लिए, जो सब नागरिकों के लिए समान रूप से हो। यह समझना जरूरी है कि समान अवसर और सामाजिक न्याय किसी एक जाति के विरुद्ध नहीं, बल्कि व्यवस्था की खामियों के विरुद्ध संघर्ष का नाम है। इस संदर्भ में यह भी देखना होगा कि कई बार जातिगत संगठनों की शुरुआत वास्तविक पीड़ा और भेदभाव के अनुभव से होती है, लेकिन धीरे-धीरे वही मंच कुछ महत्वाकांक्षी लोगों के हाथ में जाकर अपने मूल उद्देश्य से भटक जाता है। जो संगठन अन्याय के ख़िलाफ़ आवाज़ उठाने के लिए बने थे, वे ही आगे चलकर दूसरों के ख़िलाफ़ नफ़रत फैलाने का माध्यम बन जाते हैं। इसलिए, समाधान यह नहीं कि हर तरह की सामुदायिक संगठित चेतना को ख़ारिज़ कर दिया जाए, बल्कि यह है कि उस चेतना को इंसाफ़, बराबरी, इंसानियत और राष्ट्रीय एकता के बड़े मूल्यों से जोड़ा जाए, न कि संकीर्ण जातीय स्वार्थ से। हमें यह भी याद रखना होगा कि भारत की असली ताक़त इसकी विविधता में निहित है। भाषा, संस्कृति, खान-पान, पहनावा, रीति-रिवाज इन सबकी भिन्नता हमारे समाज को रंगों से भर देती है। लेकिन जब यही विविधता जातिवाद के ज़हर से संक्रमित हो जाती है, तो गर्व का विषय होने के बजाय संघर्ष और टकराव का कारण बन जाती है। हमें वह दृष्टि विकसित करनी होगी जिसमें अलग-अलग जातियां और कौमें किसी सीढ़ी के पायदान की तरह ऊपर-नीचे नहीं, बल्कि इंद्रधनुष के रंगों की तरह समान और पूरक दिखाई दें। यह दृष्टि शिक्षा, संवेदनशील मीडिया, जिम्मेदार राजनीति और जागरूक नागरिकता के बिना संभव नहीं है। मीडिया और सोशल मीडिया की भूमिका यहां निर्णायक है। आज अफ़वाह, फेक न्यूज़ और भड़काऊ भाषण पल भर में लाखों लोगों तक पहुंच जाते हैं। जाति-आधारित नफ़रत भड़काने वाले वीडियो, मैसेज और पोस्ट जानबूझकर चलाए जाते हैं ताकि चुनावों में ध्रुवीकरण हो सके। ऐसे माहौल में हर आम नागरिक को यह ज़िम्मेदारी लेनी पड़ेगी कि वह बिना जांचे-परखे किसी भी जातीय या क़ौमी नफ़रत फ़ैलाने वाली बात को आगे न बढ़ाए। सवाल पूछने की आदत विकसित करनी होगी—जो मुझे यह संदेश भेज रहा है, उसका असली मक़सद क्या है? इससे किसको फ़ायदा, किसको नुक़सान पहुंचने वाला है? राजनीति अगर केवल जातीय गणित तक सीमित हो जाए, तो नीतियां भी पहचान की तंग गलियों में फंस जाती हैं। फिर शिक्षा, स्वास्थ्य, रोज़गार, पर्यावरण, तकनीक जैसे असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं और बहसें इस बात पर अटक जाती हैं कि किस जाति को कितना टिकट मिला, किस बिरादरी को कितना प्रतिनिधित्व मिला। प्रतिनिधित्व का सवाल महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन यदि वह योग्यता, ईमानदारी और जनहित से कटकर केवल जातीय समीकरण का खेल बन जाए, तो अंततः नुक़सान उसी समाज का होता है जिसकी भलाई के नाम पर यह राजनीति की जाती है। इसलिए ज़रूरत इस बात की है कि हम राजनीति से जातिवाद को पूरी तरह बाहर तो न सही, पर कम-से-कम उसकी निर्णायक भूमिका को सीमित ज़रूर करें और इसे संवैधानिक मूल्यों—न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के अधीन रखें। आज समय की मांग है कि हर नागरिक ख़ुद से कुछ बुनियादी सवाल पूछे,क्या मैं अपने बच्चे के भविष्य को केवल उसकी जाति की पहचान से परिभाषित करना चाहता हूं, या उसकी क्षमता, मेहनत और इंसानियत से? क्या मैं चाहता हूं कि मेरे आसपास का माहौल सद्भाव, सहयोग और विश्वास पर टिका हो, या हमेशा शक, नफ़रत और टकराव की आग में झुलसता रहे? क्या मैं उन नेताओं के पीछे चलूंगा जो मुझे दूसरों से लड़ाकर अपने लिए कुर्सी सुरक्षित करते हैं, या उन लोगों का साथ दूंगा जो समाज को जोड़ने, संवाद बढ़ाने और साझा विकास की राह दिखाने का काम करते हैं? किसी भी स्वस्थ लोकतंत्र में संपादकीय का काम केवल आलोचना करना नहीं, बल्कि रास्ता भी सुझाना होता है। इस नज़र से देखें तो जातिवाद और क़ौम वाद से उबरने के कुछ स्पष्ट रास्ते हमारे सामने हैं,ऐसी शिक्षा व्यवस्था, जो बच्चों के मन में बचपन से ही जाति और क़ौम से ऊपर उठकर इंसान को इंसान की नज़र से देखने की आदत डाले, ऐसा सामाजिक और आर्थिक ढांचा, जो हर नागरिक को सम्मानजनक जीवन और समान अवसर देकर उसे इस बात के लिए मजबूर न करे कि वह अपने हक़ के लिए केवल जाति के खेमे में जाकर खड़ा हो,ऐसे राजनीतिक और सामाजिक नेता, जो चुनावी लाभ के लिए आसान जातीय ध्रुवीकरण के रास्ते की बजाय कठिन लेकिन ज़्यादा टिकाऊ रास्ता चुनें,यानी नीति, कार्यक्रम और काम के बल पर भरोसा जीतें,और अंत में, ऐसी जागरूक नागरिकता, जो किसी भी तरह के विभाजनकारी नारे, भड़काऊ भाषण या जातीय उन्माद से दूरी बनाए रखे और हर स्तर पर संवाद, सद्भाव और सहयोग की संस्कृति को मज़बूत करे। निष्कर्ष के रूप में कहा जा सकता है कि जातिवाद और क़ौम वाद केवल सामाजिक बुराइयां नहीं, बल्कि राष्ट्रीय एकता और विकास के रास्ते की गंभीर बाधाएं हैं। इन्हें समाप्त करना केवल नैतिक आग्रह नहीं, बल्कि व्यावहारिक आवश्यकता भी है। यदि हम सचमुच सर्वांगीण विकास, सामाजिक न्याय और मज़बूत भारत का सपना देखते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि कोई भी जाति या क़ौम अपने आप में पूर्ण नहीं, सब एक-दूसरे के पूरक हैं। जो ताक़त हमें एकजुट होकर मिल सकती है, वह कभी बंटकर नहीं मिल सकती। इसलिए आज के इस लेख की मूल पुकार यही है,जाति और क़ौम की पहचान को नकारिए नहीं, लेकिन उसे इंसानियत, न्याय और राष्ट्रीय एकता की व्यापक पहचान के अधीन रखिए, उन चंद ख़ुदपरस्त लोगों की चाल को समझिए जो जातीय मुफ़ाद के लिए किसी भी हथकंडे का इस्तेमाल कर सकते हैं, और मिलकर ऐसा समाज बनाइए जिसमें किसी इंसान के सम्मान, अधिकार और अवसर का निर्धारण उसकी जाति नहीं, बल्कि उसकी इंसानियत और कर्म से हो।
— डॉ. मुश्ताक़ अहमद शाह
