सन्नाटा
आओ सबके सामने निकाल लो मन की गुबार,
रह गयी कहां कमी बताओ कैसे हो गयी हार,
कब,कौन,कैसे जलाया अपने घर की लंका,
ढोल वोल कुछ भी नहीं और थोथे की बज रही डंका,
तोड़ने लगी दम,
बंधी आस जितनी हरदम,
सब तरफ थी लगायी गयी आग,
सर झुकने लगा उनका जिन पर था नाज,
जैसे तैसे आ रही थी जिंदगी पटरी पर,
आने लगा बर्बादी का आलम बेधड़क
लोग करने लगे यकीं विश्वस्त झूठे खबरी पर,
बढ़ गये इतने वाचाल पर वाचाल,
भू तोड़ के निकला है ये रहता था पाताल,
अगल बगल लिये वो चला डकैतों को बना अंगरक्षक,
पहले भी था वही और आज भी है भक्षक,
माहौल बदल गया अब तो है सन्नाटा चारों तरफ,
डर की इतनी बढ़ी गर्मी चुभने लगा है बरफ,
दिन को दिन और रात को रात भला कैसे हम मानें,
ऐलान जब तलक न कर दे ताकतवर-वृद्ध सयाने,
कटेगी ऐसी ही जिंदगी चलेगा कारवां यूं बस,
बलशाली कोई बचा नहीं जो रोके उनकी हवस।
— राजेन्द्र लाहिरी
