मेरी उदासी सिर्फ मेरी है
मेरी उदासी सिर्फ मेरी है
उससे किसी और को क्या
जिंदगी में कुछ ऐसे भी लोग होते हैं
कहने को हज़ारों पर अकेले होते हैं
मिटा सके जो तहरीर रंजोगम की
वो हमनशीं कहाँ सबको नसीब होते हैं
गुजर जाती है अक्सर तमाम जिंदगी
फिक्र के अजनबी से आगोश में
दे सके जो बेफिक्री का आलम जहां में
वो फरिश्ते कहाँ सबको नसीब होते हैं
— वर्षा वार्ष्णेय, अलीगढ़
