पत्थर हूँ मैं
इंसान नज़र आता बंजर हूँ मैं
ठोकरों से देखो बना पत्थर हूँ मैं
टूटे एहसास,टूटे ख्वाब-ख्वाहिशें
मेरी खुशियों के महल , इमारतें
तिरस्कार पाता शामों सहर हूँ मैं
ठोकरों से देखो………..
ज़रुरत के रिश्ते, अपनों का स्वार्थ
टूटा पल-पल विश्वास,मिला आघात
झेलता अपनों, गैरों का कहर हूँ मैं
ठोकरों से देखो……..
जब तक चलता रहा अच्छा था मैं
धन-दौलत लुटाता तब अपना था मैं
बदसूरत हुआ कहते वो बद्तर हूँ मैं
ठोकरों से देखो…….
मजबूर नैन ख़ामोशी से अपमान सहा
मैं अस्वस्थ अब झुक गया न खड़ा रहा
सारे ताने, कड़वाहटों का असर हूँ मैं
ठोकरों से देखो…….
— कामनी गुप्ता
