मुक्तक/दोहा

आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान

खिली-खिली हो ज़िंदगी, महक उठें अरमान।
आशा है नव साल की, सुखद बने पहचान॥

दर्द-दुखों का अंत हो, विपदाएँ हों दूर।
कोई भी न हो कहीं, रोने को मजबूर॥

छेड़ रही है प्यार की, मीठी-मीठी तान।
नए साल के पंख पर, ख़ुशबू भरी उड़ान॥

बीत गया यह साल तो, देकर सुख-दुःख मीत।
क्या पता? क्या है बुना? नई भोर ने गीत॥

माफ़ करे सब गलतियाँ, होकर मन के मीत।
मिटे सभी की वेदना, जुड़े प्यार की रीत॥

जो खोया वह सोचकर, होना नहीं उदास।
जब तक साँसें हैं मिलीं, रख खुशियों की आस॥

पिंजड़े के पंछी उड़ें, करते हम बस शोक।
जाने वाला जाएगा, कौन सके है रोक॥

पथ के शूलों से डरे, यदि राही के पाँव।
कैसे पहुँचेगा भला, वह प्रियतम के गाँव॥

रुको नहीं, चलते रहो, जीवन है संघर्ष।
नीलकंठ होकर जियो, विष तुम पियो सहर्ष॥

दुःख से मत भयभीत हो, रोने की क्या बात।
सदा रात के बाद ही, हँसता नया प्रभात॥

चमकेगा सूरज अभी, भागेगा अँधियार।
चलने से कटता सफ़र, चलना जीवन सार॥

काँटें बदले फूल में, महकेंगे घर-द्वार।
तपकर दुःख की आग में, हमको मिले निखार॥

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh