मुक्तक/दोहा

मुक्तक

आवाज लगानी थी तो लगा दी
जो बात बतानी थी वो बता दी।
तुम करते रहना इंतजार अब,
प्यास जगानी थी तो जगा दी।

मेरा ही मोल लगाने चली है दुनिया,
सरेआम बरगलाने चली है दुनिया।
बिना पेंदी का लोटा है “विकास”,
यही सबको बताने चली है दुनिया।

सुनो! रवानगी के आदेश आ चुके हैं,
यम के दूत बदल कर भेष आ चुके हैं।
आँखों से एक कतरा न गिरा देना तुम,
सोचना मांगने को दरवेश आ चुके हैं।

आँखों में आँसू हों तब भी रो नहीं पाता हूँ,
चाहकर भी मैं किसी का हो नहीं पाता हूँ।
सारी रात बीत जाती है करवटें बदलते हुए,
मैं सुकून की नींद दो पल सो नहीं पाता हूँ।

— डॉ. विकास शर्मा

डॉ. विकास शर्मा

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