दोहा छंद
कहर शीत का चल रहा, काँप रहे हैं गात।
जलता सौख्य अलाव भी, उर्जित सखा प्रभात।।
साथी बैठे सब मिलें, खिलता रहें अलाव।
बातों से ऊष्मा मिलें, खलता नहीं अभाव।।
कहर शीत का चल रहा, काँप रहे हैं गात।
जलता सौख्य अलाव भी, उर्जित सखा प्रभात।।
साथी बैठे सब मिलें, खिलता रहें अलाव।
बातों से ऊष्मा मिलें, खलता नहीं अभाव।।