बाल कविता
बिल्ली बोली म्यांयूँ म्यांयूँ
मुझको न परेशां करो
पेट भरा हुआ है मेरा
धूप में लेटी करती मैं आराम
मौसम है ठंडा ठंडा
जिस्म को अच्छी लगे
कुनकुनी यह धूप
आओ तुम भी नज़दीक बैठो
मिलकर गप्प लगाते हैं
बैठे बैठे दोनों मिल
इस धूप का आनंद उठाते हैं
कुछ ही दिनों का यह आनंद है
फिर काटेगी यही तन को
