ढल गए टल गए
ढल गए टल गए, दिन कहाँ वे रहे,
वक्त आया किए और फिर चल वे दिए;
दर्द कुछ थे दिए, सर्द कुछ थे किए,
मर्ज़ कुछ थे रहे, औ चले वे गए!
जिंदगी में घड़ी कितनी आईं गईं,
बंदगी की तरफ वे धकेले गईं;
मुझसे खेले गईं, मुझको रेले गईं,
एक अदद सी कड़ी में, पिरोये गईं!
साथ मुझको ढले, सजा सपने चले,
बाँचते जग रहे, और हम बँच गए;
बच गए फंस गए, या निकल फिर गए,
ऐस ही जिंदगी के नज़ारे रहे!
हम गुज़ारा किए और गुजर मग गए,
हर घड़ी थी रही, कुछ इशारे किए;
देखते समझते, सुनके कुछ सुनाते,
हर गली औ कली की कथा हम सुने!
चाहते कुछ रहे, और पा कुछ गए,
ज़िंदगी के घने वन से गुज़रा किए;
‘मधु’ थे चलते रहे, चख चखा ख़ुश रहे,
खोज में खो गए, खुद खुदा मिल गए!
— गोपाल बघेल ‘मधु’
