ग़ज़ल
नील परी सी लगी मुझे, नील अंबर से परिधान में,
दिल अटक कर रह गया तुम्हारी सौम्य मुस्कान में।
माथे पर सजा लाल टिका लगे सूर्य की लाली सा,
अठखेलियाँ करती लटें लगें घटा हो आसमान में।
तुम्हारी आँखों की गहराई कम नहीं किसी झील से,
सुबह की ओस की बूंद जैसे पहने झुमके कान में।
गुलाब की दो अधखिली पंखुड़ियों से लब तुम्हारे,
सादगी तुम्हारी हलचल मचाये दिल ए नादान में।
सर्द दुपहरी में खिली सुनहरी धूप सा ये यौवन,
ये आईना भी पढ़ने लगे गज़ल तुम्हारी शान में।
छलकते जाम सा नशा हो गया तुम्हें देखकर,
देखो “विकास” भी चला मांगने तुम्हें वरदान में।
— डॉ. विकास शर्मा
