कविता

अरावली की पहाड़ियॉं

यह कैसा न्याय प्रिय शासन और कैसी यह आधुनिकता की मुहिम,
विकास की दौड़ में हरीतिमा को बना रहे हो एक क्षेत्र तुम कृत्रिम,
छीन रहे हो अरावली के इर्द-गिर्द फैले राज्यों की शुद्ध हवा पानी,
और तोड़ रहे हो घरौंदा मूक पशु-पक्षियों का बनाकर नई कहानी ।

एक स्वस्थ बीज से पौधे को वृक्ष बनने में लग जाते हैं कितने वर्ष,
झटके से उसी वृक्ष की जड़ों ओ उखाड़ने चले बिना सोचे निष्कर्ष,
तुम खंजर चला रहे हो माता की छाती पर शर्मशार हुई इंसानियत,
प्रकृति को बेरंग कर मरूस्थल बना रहे हो जो थी बेहद खुबसूरत ।

क्या तुमने बसाया उजाड़ने से पहले एक नया प्राकृतिक संसार,
क्या तुमने सोचा फैसला लेने से पहले “आनंद” मानवता विचार,
कितना दर्दनाक होगा अरावली की पहाड़ियों पर ये नवनिर्माण,
जहॉं से जुडे है अनेकों जीवों और जनता के भावनात्मक प्राण ।

शायद तुम नहीं जानते हो मरूस्थल में एक हरे पेड़ की भूमिका,
वो कर देता है आग उगलती लपटों से थके हारे बदन को हल्का,
एक हरा वृक्ष भीषण गर्मी में जानलेवा लू के थपेड़ो से रक्षा करता,
और जल की एक-एक बूॅंद व बारिश के पानी को संजोकर रखता ।

— मोनिका डागा “आनंद”

मोनिका डागा 'आनंद'

चेन्नई, तमिलनाडु