गीतिका/ग़ज़ल

ग़ज़ल

मैंने गीत नया गाया है।
आनंद मुझे ही आया है।।

भाग्य लिखा था जितना अच्छा।
अधिक उसी से ही पाया है।।

देखो रहता है वह गुपचुप।
आज ज़रा-सा मुस्काया है।।

आँखों से बातें वह करता।
मुख से भेद निकल पाया है।।

तू तो सीधा-सादा ही था।
किसने तुझको उकसाया है।।

सुन देखो बात बड़ों की ही।
खुद को उसने समझाया है।

भंडार भरा धन-दौलत का।
राख बनी पर यह माया है।।

छोड़ गये सब तेरे साथी।
मेरे सुनने में आया है।।

कैसी यह तक़दीर लिखी जो।
सबने ही तो ठुकराया है।।

— रवि रश्मि ‘अनुभूति’

Leave a Reply