कविता

मकर संक्रांति का संदेश

आई मकर संक्रांति शुभ,
ले आई नव आलोक।
उत्तरायण पथ पर बढ़ा
सूरज का स्वर्णिम लोक।।

आँगन-आँगन हर्ष बिखेरा,
पतंगों का उत्सव छाया।
नील गगन की गोद में
बाल मन ने स्वप्न सजाया।।

पर एक विनती, एक विचार,
सुन लो बच्चों, ध्यान धरें
निर्दय डोर, विदेशी डोर,
जिससे घायल पंख झरें।।

चायना डोर न क्रूर खेल,
यह न उत्सव की शान।
इससे कटते नन्हे हाथ,
चिड़ियों की जाती जान।।

अपनी सूती, सरल डोर
सुरक्षा का पाठ पढ़ाए।
खेल-खेल में जीवन का
मूल्य हमें समझाए।।

तिल-गुड़ जैसे मधुर बनें,
वाणी, व्यवहार, विचार।
संस्कृति संग सुरक्षा भी
उत्सव का हो आधार।।

मकर संक्रांति यही कहे
हर्ष हो, पर हो विवेक।
जीवन से बढ़कर कुछ नहीं,
यही पर्व का सच एक।।

— गोपाल कौशल भोजवाल

गोपाल कौशल "भोजवाल"

नागदा जिला धार मध्यप्रदेश 99814-67300