कविता

जहाँ कक्षा बंद है और नारा ज़िंदा

शिक्षा के काग़ज़ी जहाज़
सत्ता की नहर में डुबोए जा रहे हैं,
कक्षाओं पर ताले जड़ दिए गए हैं
और मैदानों में नारे बोए जा रहे हैं।

कितने मौसम और बीतेंगे
मुफ़्त की थाली के भरोसे?
कब पूछेगा तू—
मेरे बच्चे सोच से क्यों खाली हो रहे हैं?

जिस्म सलामत हैं सबके,
पर सपनों का क्या होगा?
जब सवाल ही मर जाएँ भीतर,
तो आने वाला कल किसका होगा?

मुफ़्त की थाली ने
रीढ़ की हड्डी चबा ली है,
जो कल तक आँखों में आग था,
आज उसकी ज़ुबान सिला दी है।

जिस्म सही-सलामत हैं,
दिमाग़ अपाहिज कर दिए गए,
सल्तनत की उम्र बढ़ाने को
नागरिक नहीं—अनुयायी गढ़े गए।

समय रहते पूछ ले, ऐ आदमी—
ये ख़ामोशी किसकी जीत है?
सौरभ आज भी याद आते हैं,
क्योंकि हर चुप्पी
एक साज़िश होती है।

— डॉ. प्रियंका सौरभ

*डॉ. प्रियंका सौरभ

रिसर्च स्कॉलर इन पोलिटिकल साइंस, कवयित्री, स्वतंत्र पत्रकार एवं स्तंभकार, (मो.) 7015375570 (वार्ता+वाट्स एप) facebook - https://www.facebook.com/PriyankaSaurabh20/ twitter- https://twitter.com/pari_saurabh